यहीं गोकुल यहीं विन्दावन बन जाए

आसमां झुक के धरा से सदा ही कहता ये ,
राधा बिन होली कैसी श्याम यही समझाये।

प्रेम के रंग बिना रंग सभी फीके हैं,
जिसको मिल जाए ये वो मालामाल हो जाए ॥

न हो जहां बैर-भाव ऎसे मीत पाएं सब,
दिल में खिलें गुलाब ऎसी प्रीत पा जाए ॥

नाचे मीरा सी कोई , कोई पुजारिन राधा,
और गिरिराज भी घनश्याम स्वयं बन जाए ॥

कृष्ण   की बंशी बजे गोपियों की थिरकन हो,
यहीं गोकुल यहीं पे विन्दावन बन जाए ॥

आओ सब मिलकर रंगों में डूब जाएं हम
प्रेम ही प्रेम हो बस प्रेम ही बरसा जाएं   ॥

डा. रमा द्विवेदी

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कुछ मुक्तक (ज़िन्दगी पर)

पद को पाने के लिए
साज़िश हुई है ज़िन्दगी ।
किस तरह सिक्का जमे,
दूभर हुई है ज़िन्दगी ॥

*    *    *    *    *    * 

शकुनी की चालाकियां
आज भी तो कम नहीं ।
भीष्म की चतुराइयों में भी,
सिर झुकाती ज़िन्दगी ॥

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आंख से सब देखते हैं,
पर कुछ नही  कह पाते हैं ।
सच्चाई का दांव भी,
हार जाती ज़िन्दगी ॥

*    *    *    *    *    *   *   

दुर्योधन की महत्वाकांक्षाएं
आज भी हर घर में हैं ।
कर्ण की अहंकारिता
नष्ट करती ज़िन्दगी ॥

*    *    *    *    *    *    * 

दु:शासन आज भी तो
द्रोपदी का चीर हैं हर रहे ।
इक्कीसवीं-सदी में भी
क्यों नग्न होती ज़िन्दगी ॥

*     *    *    *    *    *    * 

द्रोपदी के अपमान का
प्रतिशोध है यह ज़िन्दगी ।
युद्ध की संभावना का
दंश है यह ज़िन्दगी ॥

*    *     *     *     *     *   * 

धृतराष्ट्र की धृष्टता की ,
मोहताज़ है यह ज़िन्दगी ।
जीत में भी हार का
अहसास सी है ज़िन्दगी ॥

*    *     *    *    *     *     * 

भारत की आजादी ने
नारियों को क्या दिया ?
भ्रूण -हत्या ,वधु-हत्या,,नग्न तन -मन
यही सब देती रही है ज़िन्दगी ॥

*     *    *     *     *     *      * 

आधुनिक सभ्य समाज में भी,
नारी इन्सान न बन सकी,
मां,बहिन, पत्नी,प्रेयसी बन ,
बस पिस रही है ज़िन्दगी ॥

*     *     *     *      *     *    * 

कौन सी यह सभ्यता है,
कुछ समझ आता नहीं।
खुश यहां कोइ नहीं ,
बस मिट रही है ज़िन्दगी ॥ 

डा. रमा द्विवेदी

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अगर प्यार के ये झरोखे न होते

दा ने अगर दिल मिलाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते|

न यह हिम पिघलता न नदियां ये बहती
न नदियां मचलती न सागर में मिलती।
सागर की बाहों में गर समाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |

न साग्र यह तपता न बादल ये बनते
न बादल पिघलते न जलकण बरसते
जलकण धरा मे गर समाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |

न रितुयें बदलती न ये फूल खिलते
न तितली बहकती naभौरे मचलते
अगर प्यार के ये झरोखे न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते

खुदा ने अगर दिल मिलाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |

डा. रमा द्विवेदी

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दे दो आकाश हमको

कहने को तो कुछ भी कहो ,स्वीकार नहीं हमको ।
हम जैसे हैं वैसे ही हैं,इन्कार नहीं हमको ॥

 

खामोश भी जब हम रहे,कमजोर समझा हमको |
तोडेंगे मौन अपना देंगे जवाब तुमको ।
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

 

प्रश्नों के कठघरे में घेरा है तुमने हमको ।
लेंगे हिसाब इक-इक देना पडेगा तुमको ।
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

 

पत्थर भी टूट जाए कोसा है इतना हमको |
सभ्यता का पाठ फिरसे पढ.ना पडेगा तुमको
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ।

 

देखी नही जाती है सफलता हमारी तुमको ।
भारी पडी इक नारी दे दी शिकस्त तुमको ||
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

 

राज़ मुबारक तुमको,ताज़ मुबारक तुमको |
बस चाहते हैं इतना दे दो आकाश हमको ।|
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

डा. रमा द्विवेदी
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मेरे काव्य-सन्ग्रह “दे दो आकाश ” से लिया गया गीत

 

kuch apne baare me

कुछ अपने  बारे
में………

   मैं डा रमा द्विवेदी
हूं।बीस वर्षों के
हिन्दी अध्यापन के
उपरान्त            मैंने
आकसिमक अवकाश  ले
लिया है।स्वतंत्र
लेखन में कविता
,कहानी, लेख ,निबन्ध
शोध-पत्र आदि में
विशेष रुचि है एवं
साहित्यिक पत्रिका
“पुष्पक” कादमिबनी
क्लब, हैदराबाद  की
संपादक हूं।गीत -
संगीत मुझे बहुत
प्रिय हैं।नारियों
की दयनीय  सिथति के
प्रति विशेष
संवेदनशील हूं। अपनी
कविताओं के माध्यम से
उनमें जागरुकता लाना
चाहती हूं ऒर समाज के
लोगों का ध्यान उनकी
समस्याओं की ऒर खीचना
चाहती हूं।ताकि उनको
भी स्वतंत्र पहचान
एवं उडान भरने के लिए
खुला आसमान मिल सके
।बस यही मेरे जीवन का
लक्ष्य है ।मेरी
अधिकतर कविताओं
मेंयही भावना
परिलक्षित होती
है।वैसे मैं वर्षों
से लिखती रही हूं
लेकिन  एक ही पुस्तक
“दे दो आकाश” काव्य
संग्रह सितम्बर २००५
में प्रकाशित हुई
है।बस इतना ही बाकी
आप कविताओं को पढ.कर
स्वयं समझ सकेगे………..