अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

दे दो आकाश हमको

कहने को तो कुछ भी कहो ,स्वीकार नहीं हमको ।
हम जैसे हैं वैसे ही हैं,इन्कार नहीं हमको ॥

 

खामोश भी जब हम रहे,कमजोर समझा हमको |
तोडेंगे मौन अपना देंगे जवाब तुमको ।
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

 

प्रश्नों के कठघरे में घेरा है तुमने हमको ।
लेंगे हिसाब इक-इक देना पडेगा तुमको ।
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

 

पत्थर भी टूट जाए कोसा है इतना हमको |
सभ्यता का पाठ फिरसे पढ.ना पडेगा तुमको
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ।

 

देखी नही जाती है सफलता हमारी तुमको ।
भारी पडी इक नारी दे दी शिकस्त तुमको ||
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

 

राज़ मुबारक तुमको,ताज़ मुबारक तुमको |
बस चाहते हैं इतना दे दो आकाश हमको ।|
हम जैसे हैं वैसे ही हैं इन्कार नहीं हमको ॥

डा. रमा द्विवेदी
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मेरे काव्य-सन्ग्रह “दे दो आकाश ” से लिया गया गीत

 

June 28, 2006 - Posted by ramadwivedi | गीत | | No Comments

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