हरियाली हर ले जाते हो

तुझमें मुझमें बस इक अन्तर,
तुम नर हो अरू मैं नारी हूं।
देती हूं जन्म मैं जीवन को ,
तुम जीवन को ठुकराते हो ॥

संबंधों का मैं संबल बनती,
अरू प्रेम की ज्योति जगाती हूं।
करती प्रयास मंगल का मैं,
तुम नफ़रत को फैलाते हो ॥

मैं फूलों की कोमलता हूं,
तुम मधुकर कठोर बन आते हो।
ले करके रस सब फूलों का ,
अन्यत्र खोज में जाते हो॥

करती हूं प्रतीक्षा सदियों तक,
तुम पलभर में घबराते हो ।
रहती हूं मौन त्याग करके,
तुम पल-पल हमें जताते हो॥

खोने का डर तो तुमको है,
इसलिए झपट सब लेते हो ।
कहने को कुछ नहीं पास मगर,
इतिहास नया रच जाते हैं॥

सरिता सलिला सी बहती हम,
सिंचित करती हैं जीवन को।
तुम रहते स्थिर एक जगह ,
कूलों सा कठोर बन जाते हो॥

वन-उपवन की सुन्दरता हम,
तुम पतझड. बन कर आते हो।
करते हो तांडव न्रत्य तुम्हीं,
हरियाली हर ले जाते हो ॥

संघर्षों में जी लेते हम,
तुम सुख को गले लगाते हो।
करते हो सुख परिवर्तन भी,
बादल बन उड.-उड. जाते हो॥

डा.रमा द्विवेदी

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Published in:  on July 29, 2006 at 1:33 pm Comments (1)

जीवन मूल्यों में विप्लव हो

इतना भी संत्रास न दो,
कोमलता जग से मिट जाए।
जीवन मूल्यों में विप्लव हो,
शिव का सिंहासन हिल जाए ॥

 

जब जब नारी हुई कुपित,
सिंहासन भी बदल गए हैं।
इंसानों की बात ही क्या?
स्वयं राम वनवास गए हैं॥

 

मद तेरा इस कदर बढा कि,
नशा और भी तुझे चाहिए ।
कामुक शक्ति बढाने को ,
वन जीवों का भी संहार चाहिए॥

 

बर्बरता का नंगा नाच कर रहे,
तुमने हर हद तोड. है डाली ।
दुधमुंहों तक को न छोडा ,
उनकी भी हत्या कर डाली ॥

 

चेतो-चेतो अब भी चेतो,
वर्ना बचने का पाओगे न कहीं ठौर।
पौरूष दिखलाने के मार्ग कई ,
पर तुम तो कुछ कर रहे और ?

 

रिषी -मुनियों ने रची रिचाएं,
पर तुमने वासना के इतिहास रचाए।
जब आती है मौत सियार की ,
तब वे दौड. नगर मे आयें ॥

 

डा. रमा द्विवेदी

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Published in:  on July 22, 2006 at 12:13 pm Leave a Comment

कब दर्द का संवेग उठा

कब दर्द का संवेग उठा?
कब शब्दों का जाल बुना?
कब लेखनी चली कागज़ पर?
कब यह पुस्तक का आकार बना?

 

कुछ पीडाएं थी इस धरती की?
जो मुझको झकझोरित करती थीं।
सिर्फ़ बस सिर्फ़ बयां करने को,
मैंने कलम उठाई थी॥

 

प्राणी- मात्र की पीडा ही,
मेरी रचना के आधार बने।
भावों के संवेग इतना आ जाते,
मैं,मैं न रह जाती वे स्वयं लिख जाते॥

 

अन्तर्नाद आकुल-व्याकुल करता,
तब मैं क्या-क्या लिख जाती,
कुछ ऎसे ही पलों की,
बस मैं साक्षी बन जाती॥

 

हैरान हूं खुद की रचनाएं देख,
सोचा तो न था रचूंगी पुस्तक एक,
यह सब मां शारदे का है आशीष,
जो चाहती हूं बांटना, मैं सबके बीच॥

 

डा. रमा द्विवेदी

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Published in:  on July 20, 2006 at 1:12 pm Leave a Comment

आधुनिक नारी के नाम

 

 

नारी तू जगजननी है,जगदात्री है,
तू दुर्गा है ,तू काली है,
तुझमें असीम शक्ति भंडार,
फ़िर क्यों इतनी असहाय, निरूपाय,
याद कर अपने अतीत को,
तोड.कर रूढियों-
बंधनों एवं परम्पराओं को.
आंख खोल कर देख,
दुनिया का नक्शा ,
कुछ सीख ले,
वर्ना पछ्तायेगी,
तू सदियों पीछे,
पहुंचा दी जायेगी ।

 

तू क्यों पुरूष के हाथ की,
कथपुतली बन शोषित होती है?
तू दुर्गा बन, तू महालक्ष्मी बन
तू क्यों भोग्या समर्पिता बनती है?
यह पुरूष स्वयं में कुछ भी नहीं,
सब तूने ही है दिया उसे,
वही तुझे आज शोषित कर,
अन्याय और अत्याचार कर,
तुझे विवश करता है,
अस्मिता बेचने के लिए,
और तू निर्बल बन,
घुटने टेक देती है ।
क्यों???
क्या तू इतनी निर्बल है?
अगर ऎसा है-
तो घर में ही बैठो,
बाहर निकलने की-
जरूरत नहीं,
पर यह मत भूलो कि-
घर में भी तेरा शोषण होगा ही
फर्क होगा सिर्फ़ ,
हथियारों के इस्तेमाल में ।
तूने इतने त्याग- कष्ट सहे हैं-
किसके लिए?
अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की,
रक्षा के लिए,
या
दूसरो के लिए?
सोच ले तू कहां है?
सब कुछ देकर,
तेरे पास अपना,
क्या बचा है?
कुछ पाने के लिए संघर्ष कर ।
भौतिक सुखों को त्याग कर,
नर-पाश्विकता से जूझ कर,
स्वयं अपने पथ का निर्माण कर,
अपनी योग्यता से आगे बढ. ।
मत सह पुरूष के अत्याचार,
द्ढ. संकल्प लेकर,
बढ. जा जीवन पथ पर,
निराश न हो,
घबरा कर कर्म पथ से,
विचलित न हो,
तू अडिग रह, अटल रह,
अपने लक्ष्य पर,
तेरी विजय निश्चित है ।

 

तू अपनी “पहचान” को,
विवशता का रूप न दे,
वर्ना नर भेडि.ये तुझे,
समूचा ही निगल जाएंगे ।
खोकर अपनी अस्मिता को,
कुछ पा लेना ,
जीवन की सार्थकता नहीं,
आत्म ग्लानि तुझे,
नर्काग्नि में जलायेगी ।
इसलिए तू सजग हो जा,
तू इन्दिरा ,गार्गी, मैत्रेयी,
विजय लक्ष्मी बन,
कर्म में प्रवत्त हो,
अपने लक्ष्य तक पहुंच ।
पुरूष के पशु को पराजित कर,
स्वयं की महत्ता उदघाटित कर,
इसी में तेरे जीवन की,
सार्थकता है,
और
जीवन की महान उपलब्धि भी॥

 

डा. रमा द्विवेदी   

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        (१९८७ में रचित)

Published in:  on July 17, 2006 at 5:28 pm Leave a Comment

सत्य अपना अपना

सत्य, सत्य है
झूठ भी अपने आप
में
सत्य है।
सबको अपना सत्य,
स्वयं ही जीना
पड़ता है।
सत्य अच्छा या
बुरा
होता नहीं,
उसे रूप देता है
इन्सान ।
आधुनिक जीवन का
सत्य,
टुकडों-टुकडों
में बँट गया है।
ऊपर से नीचे तक,
बड़े से छोटे तक ,
कौन हैं वे?
जिनका झूठ, उनका
सत्य न हो।
सभी अपने सत्य को
जीने में उलझे हैं,
मकडी के जाल जैसा,
नहीं निकल पाता
कोई,
अपने सत्य से ।
स्वयं ही तो रचा था ,
सत्य का चक्रब्यूह,
अब नही भेद पाते इसे,
आना पड़ेगा फ़िर
किसी अर्जुन को ?
सत्य का
चक्रब्यूह भेदने केलिए,
तब तक करो इन्तज़ार,
सहते रहो खुद क
संताप,
यह तुम्हारा अपना है,
किसी ने दिया नहीं ।
समेट लो टुकडे-टुकडे सत्य को
समाहित कर लो
अपने अन्दर ,
विष-अमृत के घूंट,
मंथन करो स्वयं ही,
सत्य के दर्शन पा
जावोगे।
बिखर- बिखर कर
जीना छोड़ो,
पूर्णता में
जिवो,
इसी में जीवन की
अमरता है,
और
संसार का सुख भी।

डा. रमा द्विवेदी

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Published in:  on July 12, 2006 at 5:59 pm Leave a Comment