हरियाली हर ले जाते हो

तुझमें मुझमें बस इक अन्तर,
तुम नर हो अरू मैं नारी हूं।
देती हूं जन्म मैं जीवन को ,
तुम जीवन को ठुकराते हो ॥

संबंधों का मैं संबल बनती,
अरू प्रेम की ज्योति जगाती हूं।
करती प्रयास मंगल का मैं,
तुम नफ़रत को फैलाते हो ॥

मैं फूलों की कोमलता हूं,
तुम मधुकर कठोर बन आते हो।
ले करके रस सब फूलों का ,
अन्यत्र खोज में जाते हो॥

करती हूं प्रतीक्षा सदियों तक,
तुम पलभर में घबराते हो ।
रहती हूं मौन त्याग करके,
तुम पल-पल हमें जताते हो॥

खोने का डर तो तुमको है,
इसलिए झपट सब लेते हो ।
कहने को कुछ नहीं पास मगर,
इतिहास नया रच जाते हैं॥

सरिता सलिला सी बहती हम,
सिंचित करती हैं जीवन को।
तुम रहते स्थिर एक जगह ,
कूलों सा कठोर बन जाते हो॥

वन-उपवन की सुन्दरता हम,
तुम पतझड. बन कर आते हो।
करते हो तांडव न्रत्य तुम्हीं,
हरियाली हर ले जाते हो ॥

संघर्षों में जी लेते हम,
तुम सुख को गले लगाते हो।
करते हो सुख परिवर्तन भी,
बादल बन उड.-उड. जाते हो॥

डा.रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

जीवन मूल्यों में विप्लव हो

इतना भी संत्रास न दो,
कोमलता जग से मिट जाए।
जीवन मूल्यों में विप्लव हो,
शिव का सिंहासन हिल जाए ॥

 

जब जब नारी हुई कुपित,
सिंहासन भी बदल गए हैं।
इंसानों की बात ही क्या?
स्वयं राम वनवास गए हैं॥

 

मद तेरा इस कदर बढा कि,
नशा और भी तुझे चाहिए ।
कामुक शक्ति बढाने को ,
वन जीवों का भी संहार चाहिए॥

 

बर्बरता का नंगा नाच कर रहे,
तुमने हर हद तोड. है डाली ।
दुधमुंहों तक को न छोडा ,
उनकी भी हत्या कर डाली ॥

 

चेतो-चेतो अब भी चेतो,
वर्ना बचने का पाओगे न कहीं ठौर।
पौरूष दिखलाने के मार्ग कई ,
पर तुम तो कुछ कर रहे और ?

 

रिषी -मुनियों ने रची रिचाएं,
पर तुमने वासना के इतिहास रचाए।
जब आती है मौत सियार की ,
तब वे दौड. नगर मे आयें ॥

 

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

कब दर्द का संवेग उठा

कब दर्द का संवेग उठा?
कब शब्दों का जाल बुना?
कब लेखनी चली कागज़ पर?
कब यह पुस्तक का आकार बना?

 

कुछ पीडाएं थी इस धरती की?
जो मुझको झकझोरित करती थीं।
सिर्फ़ बस सिर्फ़ बयां करने को,
मैंने कलम उठाई थी॥

 

प्राणी- मात्र की पीडा ही,
मेरी रचना के आधार बने।
भावों के संवेग इतना आ जाते,
मैं,मैं न रह जाती वे स्वयं लिख जाते॥

 

अन्तर्नाद आकुल-व्याकुल करता,
तब मैं क्या-क्या लिख जाती,
कुछ ऎसे ही पलों की,
बस मैं साक्षी बन जाती॥

 

हैरान हूं खुद की रचनाएं देख,
सोचा तो न था रचूंगी पुस्तक एक,
यह सब मां शारदे का है आशीष,
जो चाहती हूं बांटना, मैं सबके बीच॥

 

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

आधुनिक नारी के नाम

 

 

नारी तू जगजननी है,जगदात्री है,
तू दुर्गा है ,तू काली है,
तुझमें असीम शक्ति भंडार,
फ़िर क्यों इतनी असहाय, निरूपाय,
याद कर अपने अतीत को,
तोड.कर रूढियों-
बंधनों एवं परम्पराओं को.
आंख खोल कर देख,
दुनिया का नक्शा ,
कुछ सीख ले,
वर्ना पछ्तायेगी,
तू सदियों पीछे,
पहुंचा दी जायेगी ।

 

तू क्यों पुरूष के हाथ की,
कथपुतली बन शोषित होती है?
तू दुर्गा बन, तू महालक्ष्मी बन
तू क्यों भोग्या समर्पिता बनती है?
यह पुरूष स्वयं में कुछ भी नहीं,
सब तूने ही है दिया उसे,
वही तुझे आज शोषित कर,
अन्याय और अत्याचार कर,
तुझे विवश करता है,
अस्मिता बेचने के लिए,
और तू निर्बल बन,
घुटने टेक देती है ।
क्यों???
क्या तू इतनी निर्बल है?
अगर ऎसा है-
तो घर में ही बैठो,
बाहर निकलने की-
जरूरत नहीं,
पर यह मत भूलो कि-
घर में भी तेरा शोषण होगा ही
फर्क होगा सिर्फ़ ,
हथियारों के इस्तेमाल में ।
तूने इतने त्याग- कष्ट सहे हैं-
किसके लिए?
अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की,
रक्षा के लिए,
या
दूसरो के लिए?
सोच ले तू कहां है?
सब कुछ देकर,
तेरे पास अपना,
क्या बचा है?
कुछ पाने के लिए संघर्ष कर ।
भौतिक सुखों को त्याग कर,
नर-पाश्विकता से जूझ कर,
स्वयं अपने पथ का निर्माण कर,
अपनी योग्यता से आगे बढ. ।
मत सह पुरूष के अत्याचार,
द्ढ. संकल्प लेकर,
बढ. जा जीवन पथ पर,
निराश न हो,
घबरा कर कर्म पथ से,
विचलित न हो,
तू अडिग रह, अटल रह,
अपने लक्ष्य पर,
तेरी विजय निश्चित है ।

 

तू अपनी “पहचान” को,
विवशता का रूप न दे,
वर्ना नर भेडि.ये तुझे,
समूचा ही निगल जाएंगे ।
खोकर अपनी अस्मिता को,
कुछ पा लेना ,
जीवन की सार्थकता नहीं,
आत्म ग्लानि तुझे,
नर्काग्नि में जलायेगी ।
इसलिए तू सजग हो जा,
तू इन्दिरा ,गार्गी, मैत्रेयी,
विजय लक्ष्मी बन,
कर्म में प्रवत्त हो,
अपने लक्ष्य तक पहुंच ।
पुरूष के पशु को पराजित कर,
स्वयं की महत्ता उदघाटित कर,
इसी में तेरे जीवन की,
सार्थकता है,
और
जीवन की महान उपलब्धि भी॥

 

डा. रमा द्विवेदी   

© All Rights Reserved

        (१९८७ में रचित)

सत्य अपना अपना

सत्य, सत्य है
झूठ भी अपने आप
में
सत्य है।
सबको अपना सत्य,
स्वयं ही जीना
पड,ता है।
सत्य अच्छा या
बुरा
होता नहीं,
उसे रूप देता है
इन्सान ।
आधुनिक जीवन का
सत्य,
टुकडों-टुकडों
में बžंट गया है।
उपर से नीचे तक,
बडे से छोटे तक ,
कौन हैं वे?
जिनका झूठ, उनका
सत्य न हो।
सभी अपने सत्य को
जीने में उलझे हैं,
मकडी के जाल जैसा,
नहीं निकल पाता
कोई,
अपने सत्य से ।
स्वयं ही तो रचा था ,
सत्य का
चक्रब्यूह,
अब नही भेद पाते
इसे,
आना पडेगा फ़िर
किसी अर्जुन को ?
सत्य का
चक्र्ब्यूह भेदने केलिए
तब तक करो इन्त्जार,
सहते रहो खुद क
संताप,
यह तुम्हारा अपना है,
किसी ने दिया नहीं ।
समेट लो टुकडे,-
टुकडे सत्य को
समाहित कर लो
अपने अन्दर ,
विष अमिरत के घूंट,
मंथन करो स्वयं ही,
सत्य के दर्शन पा
जावोगे।
बिखर- बिखर कर
जीना छोडो,
पूर्णता में
जिवो,
इसी में जीवन की
अमरता है,
और
संसार का सुख भी।

डा. रमा द्विवेदी

 © All Rights Reserved

 

परिभाषाएं अलग-अलग

हर एक के सुख की परिभाषाएं अलग होती हैं,
सभ्यता का पाठ पढाने वाली पाठशालाएं अलग होती हैं ।
अनुभव प्राप्त करने की कार्यशालाएं अलग होती हैं,
जो प्रेम में सराबोर कर दें, वे मधुशालाएं अलग होती हैं॥

कोई अध- छलकत गगरी बन इतराता है,
कोई आसमां को छूकर भी झुक जाता है ।
कोई दूसरों को मिटा करके सुख पाता है,
कोई दूसरों को बसाने में मिट जाता है॥

कोई सुख सुविधाओं में रम जाता है,
कोई दौलत कमाने में खट जाता है।
कोई आत्म-सम्मान लुटा करके कुछ पाता है,
कोई आत्म-सम्मान बचाने में मिट जाता है॥

कोई खुश है परिश्रम की रोटी कमा कर,
कोई खुश है हराम की कमाई पाकर।
कोई खुश है बैंक बैलेन्स बढा कर,
कोई खुश है अपनी पहचान बना कर ॥

डा. रमा द्विवेदी

 © All Rights Reserved

रंगा रंगीन गुलमोहर


दुल्हन के लाल जोडे. में रंगा रंगीन गुलमोहर।
प्रिया के हाथ की मेहन्दी में रचता रंग गुलमोहर॥

यह बिंदिया में चमकत्ता चांद सा आकार लेकर के।
बहकता नींद में बनकर घटाओं सा यह गुलमोहर ॥

यह झुमको में झुमकता अरु दमकता मांग-सिन्दुर में ।
यह कंगनों में खनकता प्यार का इज़हार गुलमोहर ॥

कभी जूडे में सजता, आंख की लाली में बसता ये ।
लिपटता है कमर से करधनी सा प्यारा गुलमोहर ॥

चली इठलाती जब वो पांव की पायल करे छम-छम।
यह सजनी के महावर में भी रचता रंग गुलमोहर

उषा की लाली में उगता ,सूर्य के ढ.लने पर भी ये
दुपहरी धूप में भी खिल-खिलाता प्यारा गुलमोहर ॥

प्रिया के आने का आभास ज्यूं ही इसको मिलता है
तो झर झर के बिछाता प्यार अपना प्यारा गुलमोहर ।

धरा अरु आसमां के बीच की दूरी बहुत है पर ।
मिलन के इस क्षितिज में रंग भरता प्यारा गुलमोहर॥

डा. रमा द्विवेदी

 © All Rights Reserved

संवेदनाएं चुक गईं

 

संवेदनाएं चुक गईं,
अब और सह सकते नहीं ।
बन गया पत्थर दिल हमारा,
रहमोकरम तुम पे कर सकते नहीं ॥

 

कोशिशें तुमने बहुत कीं,
हमको मिटाने के लिए ।
जुल्म तुमने क्या- क्या किये?
हमें पत्थर बनाने के लिए ॥

 

हमारा दिल वो पत्थर है,
जो हर तूफ़ां को झेल जाता है ।
अंकित हो जाती हर तस्वीर उस पर
फ़िर नहीं मिट पाता है ॥

 

शायद तुम्हें मालूम न हो,
पत्थर का निशान होता है अमिट।
सदियों बाद पढ. सकते हैं उसे,
उसका इतिहास होता है अमिट ॥

 

तुमने जो विष बीज बोया है,
कई पीढियां मूल्य चुकाएंगी।
अब भी नहीं संभलोगे गर,
कायर तुम्हें बतलाएंगी ॥

 

तुमने रचा इतिहास जो,
कैसे बदल अब पाओगे ?
सदियों के इस पाप को,
किस पुण्य से धो पाओगे?

 

तुम करोगे जुल्म हम सहते रहेंगे-
वक्त वो जाता रहा ।
अब हम कहेंगे तुम सुनोगे,
वक्त ऎसा आ गया ॥

 

चाहे जितना आजमां लो,
देखेंगे कितना जोर तुम में है?
मोड. देंगे रुख हवा का,
हौसला इतना अभी भी हम में है ॥

 

डा.रमा द्विवेदी

 © All Rights Reserved

तलाश

वर्षों से तलाश थी जिसकी,
आज मैंने उसकी अनुभूति की,
प्रेम का स्वरूप कैसा होगा ,
कौन शब्दों में परिभाषित कर सकेगा?
क्या प्रेम गूंगा होता है?
हां येसा प्रेम मैंने देखा है एक रोज़,
चुप-चुप सा , गुमसुम सा,
पर हंसता -खिलखिलाता सा,
न वह कुछ कहता है?
न वह कुछ करता है ?
फिर भी उसका दावा है,
कि वह प्रेम करता है ।
प्रेम का कैसा यह अद्भुत रूप है?
प्रेम सच ह्रदय की अनुभूति है ।
आदमी इतना क्यों मजबूर है?
संबंधों के बोझ से क्यों चूर है?
कि प्रेम को भी खुलकर जी नहीं सकता,
जिसकी उसे तलाश है ।

 

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

 

 

१९८७ मे रचित रचना

चाहो तो तुम बुलाओ

तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ।
चाहो तो तुम पुकारो, चाहो तो न बुलाओ ॥

 

तुमने बनाया दासी, तुमने बनाया वनबासी ।
तुमने बनाया पत्थर , तुमने बनाया देवी ।
अब ऒर क्या बने हम ,चाहो तो तुम बताओ ॥
तेरी राह मे ं खडे हैं,चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

तेरे दिये गमों को पीते रहे हैं ऎसे ।
मीरा ने हंसते-हंसते विष को पिया था जैसे।
अब और क्या सज़ा है चाहो तो तुम सुनाओ ॥
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

कभी तुमने गले लगाया ,कभी तुमने हाथ छुडाया ।
कभी तुमने साथ निभाया,कभी तुमने स्वांग रचाया ।
अब और क्या बचा है, चाहो तो तुम बताओ ।
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

तेरे ही वास्ते हम ,मिटते रहे हैं हरदम ।
फिर भी वफ़ा न की तुमने करते रहे जफ़ा तुम ।
अब और क्या करोगे, चाहो तो तुम बताओ ।
तेरी राह में खडे हैं,चाहो तो तुम बताओ ॥

 

जीवन के हम हैं पूरक ,इसको न तुमने माना ।
करते रहे हो मनमानी मुशिकल हुआ निभाना ।
मझधार में है नॆया , चाहो तो तुम डुबाओ ।
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

इस युग से पूछते हैं कब तक रहेंगे शापित ।
हम खुद को ढूंढ्ते हैं अपनों के बीच अब तक ।
अब और न सहेंगे ,चाहो तो भूल जाओ ।
तेरी राह में खडे हैं ,चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

डा. रमा द्विवेदी

 © All Rights Reserved

« Previous entries