अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

करती है पानी -पानी

मर्यादाएं न टूटें, इतना भी त्रास न दो।
कोई नारी बने अम्बिका, इतना भी उपहास न दो॥

 

एक बार भीष्म ने नारी अधिकार का हरण किया था ।
वह नारी तब बनी शिखण्डी अरु अपना प्रतिशोध लिया था ॥

 

इसलिये कभी ऎसा मत करना कि कर न सको प्रायशिचत भी ।
अन्जाम भोगना पडता है हर कुकुत्य का निशिचत ही ॥

 

कोमलता को कमज़ोर समझना यह है तेरी नादानी ।
आती है बाढ. नदी में जब जग को करती है पानी- पानी ॥

 

दुष्टों नें उत्पात मचाया फिर भी धरती थमी रही है ।
जब जब धरती हुई प्रकंपित सुषिट में खलबली मची है ॥

 

डा. रमा द्विवेदी

July 3, 2006 - Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | No Comments

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