अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

चाहो तो तुम बुलाओ

तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ।
चाहो तो तुम पुकारो, चाहो तो न बुलाओ ॥

 

तुमने बनाया दासी, तुमने बनाया वनबासी ।
तुमने बनाया पत्थर , तुमने बनाया देवी ।
अब ऒर क्या बने हम ,चाहो तो तुम बताओ ॥
तेरी राह मे ं खडे हैं,चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

तेरे दिये गमों को पीते रहे हैं ऎसे ।
मीरा ने हंसते-हंसते विष को पिया था जैसे।
अब और क्या सज़ा है चाहो तो तुम सुनाओ ॥
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

कभी तुमने गले लगाया ,कभी तुमने हाथ छुडाया ।
कभी तुमने साथ निभाया,कभी तुमने स्वांग रचाया ।
अब और क्या बचा है, चाहो तो तुम बताओ ।
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

तेरे ही वास्ते हम ,मिटते रहे हैं हरदम ।
फिर भी वफ़ा न की तुमने करते रहे जफ़ा तुम ।
अब और क्या करोगे, चाहो तो तुम बताओ ।
तेरी राह में खडे हैं,चाहो तो तुम बताओ ॥

 

जीवन के हम हैं पूरक ,इसको न तुमने माना ।
करते रहे हो मनमानी मुशिकल हुआ निभाना ।
मझधार में है नॆया , चाहो तो तुम डुबाओ ।
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

इस युग से पूछते हैं कब तक रहेंगे शापित ।
हम खुद को ढूंढ्ते हैं अपनों के बीच अब तक ।
अब और न सहेंगे ,चाहो तो भूल जाओ ।
तेरी राह में खडे हैं ,चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

डा. रमा द्विवेदी

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July 4, 2006 - Posted by ramadwivedi | गीत | | No Comments

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