अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

तलाश

वर्षों से तलाश थी जिसकी,
आज मैंने उसकी अनुभूति की,
प्रेम का स्वरूप कैसा होगा ,
कौन शब्दों में परिभाषित कर सकेगा?
क्या प्रेम गूंगा होता है?
हां येसा प्रेम मैंने देखा है एक रोज़,
चुप-चुप सा , गुमसुम सा,
पर हंसता -खिलखिलाता सा,
न वह कुछ कहता है?
न वह कुछ करता है ?
फिर भी उसका दावा है,
कि वह प्रेम करता है ।
प्रेम का कैसा यह अद्भुत रूप है?
प्रेम सच ह्रदय की अनुभूति है ।
आदमी इतना क्यों मजबूर है?
संबंधों के बोझ से क्यों चूर है?
कि प्रेम को भी खुलकर जी नहीं सकता,
जिसकी उसे तलाश है ।

 

डा. रमा द्विवेदी

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१९८७ मे रचित रचना

July 4, 2006 - Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | No Comments

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