अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

संवेदनाएं चुक गईं

 

संवेदनाएं चुक गईं,
अब और सह सकते नहीं ।
बन गया पत्थर दिल हमारा,
रहमोकरम तुम पे कर सकते नहीं ॥

 

कोशिशें तुमने बहुत कीं,
हमको मिटाने के लिए ।
जुल्म तुमने क्या- क्या किये?
हमें पत्थर बनाने के लिए ॥

 

हमारा दिल वो पत्थर है,
जो हर तूफ़ां को झेल जाता है ।
अंकित हो जाती हर तस्वीर उस पर
फ़िर नहीं मिट पाता है ॥

 

शायद तुम्हें मालूम न हो,
पत्थर का निशान होता है अमिट।
सदियों बाद पढ. सकते हैं उसे,
उसका इतिहास होता है अमिट ॥

 

तुमने जो विष बीज बोया है,
कई पीढियां मूल्य चुकाएंगी।
अब भी नहीं संभलोगे गर,
कायर तुम्हें बतलाएंगी ॥

 

तुमने रचा इतिहास जो,
कैसे बदल अब पाओगे ?
सदियों के इस पाप को,
किस पुण्य से धो पाओगे?

 

तुम करोगे जुल्म हम सहते रहेंगे-
वक्त वो जाता रहा ।
अब हम कहेंगे तुम सुनोगे,
वक्त ऎसा आ गया ॥

 

चाहे जितना आजमां लो,
देखेंगे कितना जोर तुम में है?
मोड. देंगे रुख हवा का,
हौसला इतना अभी भी हम में है ॥

 

डा.रमा द्विवेदी

 © All Rights Reserved

July 9, 2006 - Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | 2 Comments

2 Comments »

  1. वाह किया बात है

    Comment by SHUAIB | July 10, 2006

  2. …अपनी मानसिकता बदलनी है,
    भूलों की गुठली उगलनी है॥
    बिना उसके किसका अस्तित्व है?
    बिना उसके किसका व्यक्तित्व है?
    -प्रेमलता

    Comment by प्रेमलता पांडे | July 10, 2006

Leave a comment