परिभाषाएं अलग-अलग

हर एक के सुख की परिभाषाएं अलग होती हैं,
सभ्यता का पाठ पढाने वाली पाठशालाएं अलग होती हैं ।
अनुभव प्राप्त करने की कार्यशालाएं अलग होती हैं,
जो प्रेम में सराबोर कर दें, वे मधुशालाएं अलग होती हैं॥

कोई अध- छलकत गगरी बन इतराता है,
कोई आसमां को छूकर भी झुक जाता है ।
कोई दूसरों को मिटा करके सुख पाता है,
कोई दूसरों को बसाने में मिट जाता है॥

कोई सुख सुविधाओं में रम जाता है,
कोई दौलत कमाने में खट जाता है।
कोई आत्म-सम्मान लुटा करके कुछ पाता है,
कोई आत्म-सम्मान बचाने में मिट जाता है॥

कोई खुश है परिश्रम की रोटी कमा कर,
कोई खुश है हराम की कमाई पाकर।
कोई खुश है बैंक बैलेन्स बढा कर,
कोई खुश है अपनी पहचान बना कर ॥

डा. रमा द्विवेदी

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Published in: on July 10, 2006 at 5:14 pm Comments (2)

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2 Comments Leave a comment.

  1. सुंदर रचना है.

  2. आपका स्वागत है यहाँ चिट्ठा जगत में!


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