सत्य अपना अपना

सत्य, सत्य है
झूठ भी अपने आप
में
सत्य है।
सबको अपना सत्य,
स्वयं ही जीना
पड़ता है।
सत्य अच्छा या
बुरा
होता नहीं,
उसे रूप देता है
इन्सान ।
आधुनिक जीवन का
सत्य,
टुकडों-टुकडों
में बँट गया है।
ऊपर से नीचे तक,
बड़े से छोटे तक ,
कौन हैं वे?
जिनका झूठ, उनका
सत्य न हो।
सभी अपने सत्य को
जीने में उलझे हैं,
मकडी के जाल जैसा,
नहीं निकल पाता
कोई,
अपने सत्य से ।
स्वयं ही तो रचा था ,
सत्य का चक्रब्यूह,
अब नही भेद पाते इसे,
आना पड़ेगा फ़िर
किसी अर्जुन को ?
सत्य का
चक्रब्यूह भेदने केलिए,
तब तक करो इन्तज़ार,
सहते रहो खुद क
संताप,
यह तुम्हारा अपना है,
किसी ने दिया नहीं ।
समेट लो टुकडे-टुकडे सत्य को
समाहित कर लो
अपने अन्दर ,
विष-अमृत के घूंट,
मंथन करो स्वयं ही,
सत्य के दर्शन पा
जावोगे।
बिखर- बिखर कर
जीना छोड़ो,
पूर्णता में
जिवो,
इसी में जीवन की
अमरता है,
और
संसार का सुख भी।

डा. रमा द्विवेदी

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Published in: on July 12, 2006 at 5:59 pm Leave a Comment

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