अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

परिभाषाएं अलग-अलग

हर एक के सुख की परिभाषाएं अलग होती हैं,
सभ्यता का पाठ पढाने वाली पाठशालाएं अलग होती हैं ।
अनुभव प्राप्त करने की कार्यशालाएं अलग होती हैं,
जो प्रेम में सराबोर कर दें, वे मधुशालाएं अलग होती हैं॥

कोई अध- छलकत गगरी बन इतराता है,
कोई आसमां को छूकर भी झुक जाता है ।
कोई दूसरों को मिटा करके सुख पाता है,
कोई दूसरों को बसाने में मिट जाता है॥

कोई सुख सुविधाओं में रम जाता है,
कोई दौलत कमाने में खट जाता है।
कोई आत्म-सम्मान लुटा करके कुछ पाता है,
कोई आत्म-सम्मान बचाने में मिट जाता है॥

कोई खुश है परिश्रम की रोटी कमा कर,
कोई खुश है हराम की कमाई पाकर।
कोई खुश है बैंक बैलेन्स बढा कर,
कोई खुश है अपनी पहचान बना कर ॥

डा. रमा द्विवेदी

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July 10, 2006 Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | 2 Comments

रंगा रंगीन गुलमोहर


दुल्हन के लाल जोडे. में रंगा रंगीन गुलमोहर।
प्रिया के हाथ की मेहन्दी में रचता रंग गुलमोहर॥

यह बिंदिया में चमकत्ता चांद सा आकार लेकर के।
बहकता नींद में बनकर घटाओं सा यह गुलमोहर ॥

यह झुमको में झुमकता अरु दमकता मांग-सिन्दुर में ।
यह कंगनों में खनकता प्यार का इज़हार गुलमोहर ॥

कभी जूडे में सजता, आंख की लाली में बसता ये ।
लिपटता है कमर से करधनी सा प्यारा गुलमोहर ॥

चली इठलाती जब वो पांव की पायल करे छम-छम।
यह सजनी के महावर में भी रचता रंग गुलमोहर

उषा की लाली में उगता ,सूर्य के ढ.लने पर भी ये
दुपहरी धूप में भी खिल-खिलाता प्यारा गुलमोहर ॥

प्रिया के आने का आभास ज्यूं ही इसको मिलता है
तो झर झर के बिछाता प्यार अपना प्यारा गुलमोहर ।

धरा अरु आसमां के बीच की दूरी बहुत है पर ।
मिलन के इस क्षितिज में रंग भरता प्यारा गुलमोहर॥

डा. रमा द्विवेदी

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July 10, 2006 Posted by ramadwivedi | गीत | | 1 Comment

संवेदनाएं चुक गईं

 

संवेदनाएं चुक गईं,
अब और सह सकते नहीं ।
बन गया पत्थर दिल हमारा,
रहमोकरम तुम पे कर सकते नहीं ॥

 

कोशिशें तुमने बहुत कीं,
हमको मिटाने के लिए ।
जुल्म तुमने क्या- क्या किये?
हमें पत्थर बनाने के लिए ॥

 

हमारा दिल वो पत्थर है,
जो हर तूफ़ां को झेल जाता है ।
अंकित हो जाती हर तस्वीर उस पर
फ़िर नहीं मिट पाता है ॥

 

शायद तुम्हें मालूम न हो,
पत्थर का निशान होता है अमिट।
सदियों बाद पढ. सकते हैं उसे,
उसका इतिहास होता है अमिट ॥

 

तुमने जो विष बीज बोया है,
कई पीढियां मूल्य चुकाएंगी।
अब भी नहीं संभलोगे गर,
कायर तुम्हें बतलाएंगी ॥

 

तुमने रचा इतिहास जो,
कैसे बदल अब पाओगे ?
सदियों के इस पाप को,
किस पुण्य से धो पाओगे?

 

तुम करोगे जुल्म हम सहते रहेंगे-
वक्त वो जाता रहा ।
अब हम कहेंगे तुम सुनोगे,
वक्त ऎसा आ गया ॥

 

चाहे जितना आजमां लो,
देखेंगे कितना जोर तुम में है?
मोड. देंगे रुख हवा का,
हौसला इतना अभी भी हम में है ॥

 

डा.रमा द्विवेदी

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July 9, 2006 Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | 2 Comments

तलाश

वर्षों से तलाश थी जिसकी,
आज मैंने उसकी अनुभूति की,
प्रेम का स्वरूप कैसा होगा ,
कौन शब्दों में परिभाषित कर सकेगा?
क्या प्रेम गूंगा होता है?
हां येसा प्रेम मैंने देखा है एक रोज़,
चुप-चुप सा , गुमसुम सा,
पर हंसता -खिलखिलाता सा,
न वह कुछ कहता है?
न वह कुछ करता है ?
फिर भी उसका दावा है,
कि वह प्रेम करता है ।
प्रेम का कैसा यह अद्भुत रूप है?
प्रेम सच ह्रदय की अनुभूति है ।
आदमी इतना क्यों मजबूर है?
संबंधों के बोझ से क्यों चूर है?
कि प्रेम को भी खुलकर जी नहीं सकता,
जिसकी उसे तलाश है ।

 

डा. रमा द्विवेदी

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१९८७ मे रचित रचना

July 4, 2006 Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | No Comments

चाहो तो तुम बुलाओ

तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ।
चाहो तो तुम पुकारो, चाहो तो न बुलाओ ॥

 

तुमने बनाया दासी, तुमने बनाया वनबासी ।
तुमने बनाया पत्थर , तुमने बनाया देवी ।
अब ऒर क्या बने हम ,चाहो तो तुम बताओ ॥
तेरी राह मे ं खडे हैं,चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

तेरे दिये गमों को पीते रहे हैं ऎसे ।
मीरा ने हंसते-हंसते विष को पिया था जैसे।
अब और क्या सज़ा है चाहो तो तुम सुनाओ ॥
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

कभी तुमने गले लगाया ,कभी तुमने हाथ छुडाया ।
कभी तुमने साथ निभाया,कभी तुमने स्वांग रचाया ।
अब और क्या बचा है, चाहो तो तुम बताओ ।
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

तेरे ही वास्ते हम ,मिटते रहे हैं हरदम ।
फिर भी वफ़ा न की तुमने करते रहे जफ़ा तुम ।
अब और क्या करोगे, चाहो तो तुम बताओ ।
तेरी राह में खडे हैं,चाहो तो तुम बताओ ॥

 

जीवन के हम हैं पूरक ,इसको न तुमने माना ।
करते रहे हो मनमानी मुशिकल हुआ निभाना ।
मझधार में है नॆया , चाहो तो तुम डुबाओ ।
तेरी राह में खडे हैं चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

इस युग से पूछते हैं कब तक रहेंगे शापित ।
हम खुद को ढूंढ्ते हैं अपनों के बीच अब तक ।
अब और न सहेंगे ,चाहो तो भूल जाओ ।
तेरी राह में खडे हैं ,चाहो तो तुम बुलाओ ॥

 

डा. रमा द्विवेदी

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July 4, 2006 Posted by ramadwivedi | गीत | | No Comments