August 31, 2006 at 1:38 am (गीत)
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं।
लम्हा-लम्हा जीते हैं,साहिल को हम पाते नहीं॥
टूट न जाए कहीं यह सांसों का है सिलसिला ।
लड रहे हैं ज़िन्दगी से मर भी हम पाते नहीं..
याद करते हैं तुम्हे,बस भूल हम पाते नहीं॥
मन मेरा बोझिल तमन्नाओं की ख्वाहिश में यहां
दिल को समझाया बहुत,बस भूल हम पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥
राहों में तुम जब मिले दिल में मेरे कुछ-कुछ हुआ।
जाने क्या हो जाता है,हम बात कर पाते नहीं..
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥
ज़िन्दगी जी लेंगे यूं ही तेरी चाहत के सहारे।
प्यार के कुछ पल तुम्हारे,भूल हम पाते नहीं….
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥
तुम मिलो या न मिलो,तेरी याद मेरे दिल में है ।
दिल मेरा बेचैन है क्यों आके बहलाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥
तेरी आंखों में भी हमने प्यार का समन्दर।
कौन सा वो राज़ है जो हमको बतलाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हे,बस भूल हम पाते नहीं॥
क्या करें?कैसे करें?तेरे प्यार से शिकवा सनम।
दिल ने है सोचा बहुत पर कुछ भी कह पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥
तुमको चाहा,तुमको पूजा,क्या खता हमसे हुई?
ऐसा मेरा प्यार है,भगवान भी पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥
डा.रमा द्विवेदी
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August 14, 2006 at 12:09 pm (गीत)
मेरे देश को भगवान नहीं,सच्चा इंसान चाहिए,
गांधी-सुभाष जैसा बलिदान चाहिए।इंसानियत विलख रही इंसान ही के खातिर,
इंसाफ दे सके जो ऎसा सत्यवान चाहिए…..
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।
बचपन यहां पे देखो बन्धुआ बना हुआ है,
दिला सके जो इनको मुक्ति ऎसा दयावान चाहिए….
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।
मुखौटों के पीछे क्या है कोई जानता नहीं है,
दिखा सके जो असली चेहरा ऎसा महान चाहिए….
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।
रोज़ मर रहे हैं यहां कुर्सी के वास्ते,
जो देश के लिए जिए-मरे,ऎसा इक नाम चाहिए….
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।
सदियों के बाद भी जो इंसां न बन सकी है,
समझ सके जो इनको इंसान,ऎसा कद्र्दान चाहिए…
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।
मेहनत से नाता टूटा सब यूंही पाना चाहें,
गीतोपदेश वाला कोई श्याम चाहिए…
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।
डा. रमा द्विवेदी
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August 11, 2006 at 4:44 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
यॊवन की ऎसी आई लहर,
मन तेरा जाए मचल-मचल।
मतवाली नदी सी दौड. रही,
रुकती नहीं है कहीं एक पहर॥
हिरनी सी कुलाचें मार रही,
दुनिया की तुझको नहीं खबर।
चुनरी तेरी जाए ढुलक-ढुलक,
लग जाय कहीं न किसी की नज़र॥
यॊवन तेरा गया निखर-निखर,
सजने लगी है तू पहर-पहर।
बांध के पांवों में पायल,
जायेगी अब तू बता किधर॥
गली गली और नगर- नगर,
ढूढ. रही तुझे कोई नज़र।
कुछ पल और तू जरा ठहर,
भूल न जाओ कहीं डगर॥
डा. रमा द्विवेदी
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(कादम्बिनी में पुरस्क्रित रचना )
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August 11, 2006 at 1:08 pm (मुक्तक)
Tags: मुक्तक
धूप संग साया चला,
पर संग में कोई न था।
छांव के संग भीड थी,
पर संग में साया ना था॥
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धूप से ही हिम गला,
धूप से बादल बना।
धूप की ही तपिश से,
हिया धरती का दरक गया॥
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धूप की ही उष्णता में,
बीज भी अन्कुर बना।
धूप की मनमानी से,
अस्तित्व भी उसका मिटा॥
* * * * * *
धूप तडपाती भी है,
धूप तरसाती भी है।
शीत से अंग-अंग गले जब,
धूप सहलाती भी है॥
* * * * * *
ज़िन्दगी के मंच में,
व्यंग्यों की धूप तेज है।
मरहम लगा लगा हंसे,
शब्दों का हेर-फेर है॥
* * * * * *
धूप की विद्रूपता से,
खुद को बचाइयेगा आप।
वर्ना जल करके कहीं,
पा जाओ न कैन्सर का शाप॥
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धूप के इस खेल में,
कल की नहीं मुझको खबर।
आज है अस्तित्व मेरा ,
कहीं न जाऊं कल बिखर॥
डा. रमा द्विवेदी
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August 8, 2006 at 5:38 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
बुझता दिया सुकूं का इंसान ही के कारण,
बुझता दिया यकीं का इंसान ही के कारण।
बुझता दिया मुहब्बत का इंसान ही के कारण,
आते हैं दुख जीवन में इंसान ही के कारण ॥
पर उम्मीद का दिया तो दिन-रात जल रहा है,
बुझता नहीं कभी वो आंधियों से लड. रहा है ।
उम्मीद पर बनीं हैं दुनियां की हर मीनारें,
उम्मीद पर टिकी हैं जीवन की हर इच्छाएं ॥
उम्मीद पर ही देखो आसमां भी छू के आएं,
उम्मीद पर ही देखो हर जुल्म से टकराएं ।
उम्मीद पर ही देखो दुश्मन जा भिड. जाएं,
उम्मीद पर ही देखो क्या-क्या न कर दिखाएं ॥
उम्मीद के सहारे तुम शान्ति फिर से लाना ,
उम्मीद के सहारे खोया विश्वास पाना।
उम्मीद के सहारे चाहत को फिर जगाना,
उम्मीद के सहारे जीवन में बहार लाना ॥
उम्मीद की कभी तुम तौहीन यूं न करना,
उम्मीद के ही बल पर हर मुश्किल से है गुजरना।
उम्मीद का दिया तुम हरदम जलाए रखना ,
उम्मीद को बचा कर खुद को बचाए रखना ॥
डा.रमा द्विवेदी
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