अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

उम्मीद का दिया जल रहा है

बुझता दिया सुकूं का इंसान ही के कारण,
बुझता दिया यकीं का इंसान ही के कारण।
बुझता दिया मुहब्बत का इंसान ही के कारण,
आते हैं दुख जीवन में इंसान ही के कारण ॥

पर उम्मीद का दिया तो दिन-रात जल रहा है,
बुझता नहीं कभी वो आंधियों से लड. रहा है ।
उम्मीद पर बनीं हैं दुनियां की हर मीनारें,
उम्मीद पर टिकी हैं जीवन की हर इच्छाएं ॥

उम्मीद पर ही देखो आसमां भी छू के आएं,
उम्मीद पर ही देखो हर जुल्म से टकराएं ।
उम्मीद पर ही देखो दुश्मन जा भिड. जाएं,
उम्मीद पर ही देखो क्या-क्या न कर दिखाएं ॥

उम्मीद के सहारे तुम शान्ति फिर से लाना ,
उम्मीद के सहारे खोया विश्वास पाना।
उम्मीद के सहारे चाहत को फिर जगाना,
उम्मीद के सहारे जीवन में बहार लाना ॥

उम्मीद की कभी तुम तौहीन यूं न करना,
उम्मीद के ही बल पर हर मुश्किल से है गुजरना।
उम्मीद का दिया तुम हरदम जलाए रखना ,
उम्मीद को बचा कर खुद को बचाए रखना ॥

डा.रमा द्विवेदी

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August 8, 2006 - Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | 2 Comments

2 Comments »

  1. बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने उम्मीद पर ही, उम्मीद के सहारे का प्रयोग प्रंशनीय है

    Comment by mahashakti | August 9, 2006

  2. kuch meri kalam se…

    ek chotaa deep jalkar,
    aaj timir ko detaa chunauti
    bhore tak jalne ko tatpar
    yaamini bhi aah leti…
    khilaa raha aabhaa se apni
    kamlaasini, suraj-mukhi ki
    aur maDham roshni bhi
    jeevatv kaa pramaaN deti
    dhekh bhanvraa ek sahsaa
    uuD chalaa jyoN madhumaas pyaasaa
    bhramitt maDham roshni mein
    DhooonDh mein prabhaat jaisa
    geet gaaker naachtaa hai,
    addh-khili see ikk kali par
    aur apni raagini mein
    deep ko kuch baat kahtaa
    neend mein anNmaNi dharaa ki
    firr nishabbdtaa hai aaj tooti
    ek chotaa deep jalkar…
    timir ko detaa chunauti…
    bhore tak jalne ko tatpar..
    yaamini bhi aah leti…

    -Ripudaman

    Comment by ripudaman | August 25, 2006

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