बुझता दिया सुकूं का इंसान ही के कारण,
बुझता दिया यकीं का इंसान ही के कारण।
बुझता दिया मुहब्बत का इंसान ही के कारण,
आते हैं दुख जीवन में इंसान ही के कारण ॥पर उम्मीद का दिया तो दिन-रात जल रहा है,
बुझता नहीं कभी वो आंधियों से लड. रहा है ।
उम्मीद पर बनीं हैं दुनियां की हर मीनारें,
उम्मीद पर टिकी हैं जीवन की हर इच्छाएं ॥उम्मीद पर ही देखो आसमां भी छू के आएं,
उम्मीद पर ही देखो हर जुल्म से टकराएं ।
उम्मीद पर ही देखो दुश्मन जा भिड. जाएं,
उम्मीद पर ही देखो क्या-क्या न कर दिखाएं ॥उम्मीद के सहारे तुम शान्ति फिर से लाना ,
उम्मीद के सहारे खोया विश्वास पाना।
उम्मीद के सहारे चाहत को फिर जगाना,
उम्मीद के सहारे जीवन में बहार लाना ॥उम्मीद की कभी तुम तौहीन यूं न करना,
उम्मीद के ही बल पर हर मुश्किल से है गुजरना।
उम्मीद का दिया तुम हरदम जलाए रखना ,
उम्मीद को बचा कर खुद को बचाए रखना ॥डा.रमा द्विवेदी
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उम्मीद का दिया जल रहा है
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बहुत ही अच्छा लिखा है आपने उम्मीद पर ही, उम्मीद के सहारे का प्रयोग प्रंशनीय है
kuch meri kalam se…
ek chotaa deep jalkar,
aaj timir ko detaa chunauti
bhore tak jalne ko tatpar
yaamini bhi aah leti…
khilaa raha aabhaa se apni
kamlaasini, suraj-mukhi ki
aur maDham roshni bhi
jeevatv kaa pramaaN deti
dhekh bhanvraa ek sahsaa
uuD chalaa jyoN madhumaas pyaasaa
bhramitt maDham roshni mein
DhooonDh mein prabhaat jaisa
geet gaaker naachtaa hai,
addh-khili see ikk kali par
aur apni raagini mein
deep ko kuch baat kahtaa
neend mein anNmaNi dharaa ki
firr nishabbdtaa hai aaj tooti
ek chotaa deep jalkar…
timir ko detaa chunauti…
bhore tak jalne ko tatpar..
yaamini bhi aah leti…
-Ripudaman