कुछ पल ठहर

यॊवन की ऎसी आई लहर,
मन तेरा जाए मचल-मचल।
मतवाली नदी सी दौड. रही,
रुकती नहीं है कहीं एक पहर॥

हिरनी सी कुलाचें मार रही,
दुनिया की तुझको नहीं खबर।
चुनरी तेरी जाए ढुलक-ढुलक,
लग जाय कहीं न किसी की नज़र॥

यॊवन तेरा गया निखर-निखर,
सजने लगी है तू पहर-पहर।
बांध के पांवों में पायल,
जायेगी अब तू बता किधर॥

गली गली और नगर- नगर,
ढूढ. रही तुझे कोई नज़र।
कुछ पल और तू जरा ठहर,
भूल न जाओ कहीं डगर॥

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

(कादम्बिनी में पुरस्क्रित रचना )

Published in: on August 11, 2006 at 4:44 pm Comments (1)

The URI to TrackBack this entry is: http://ramadwivedi.wordpress.com/2006/08/11/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%aa%e0%a4%b2-%e0%a4%a0%e0%a4%b9%e0%a4%b0/trackback/

RSS feed for comments on this post.

One Comment Leave a comment.

  1. बढियां है, बधाई.


Leave a Comment