अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

अपना नहीं कोई है

       सूना है मन का अंगना ,अपना नहीं कोई है,
       हर सांस डगमगाती सी  बेसुध हुई हुई है।

       गिरती है पर्वतों से ,सरपट वो दौडती है,
       प्रिय से मिलन को देखो पागल हुई हुई है।

       बदरी की बिजुरिया सी, अम्बर की दुलहनियां सी,
       बरसी है जब उमड  कर सतरंग हुई हुई है।

       चन्दा की चांदनी सी,तारों की झिलमिली सी,
       उतरी है जब जमीं पर शबनम हुई हुई है।

       बाहों में प्रिय के आके हर दर्द भूल जाती,
       दिल में समायी ऐसे सरगम हुई हुई है।

       इक बूंद के लिए ही बनती है वो दीवानी,
       इक बूंद जब मिली तो मुक्ता हुई हुई है।

        डा. रमा द्विवेदी  

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September 17, 2006 - Posted by ramadwivedi | गीत | | 2 Comments

2 Comments »

  1. बहुत सुंदर भाव हैं.

    Comment by समीर लाल | September 18, 2006

  2. बहुत बढिया

    Comment by SHUAIB | September 20, 2006

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