अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

तुम मेरे साथ रहो

 तुम मेरे साथ रहो घर में उजाला बनकर,
 यूं मुझे दर्द न दो दर्द की हाला बनकर ।

यूं ही चाहेगे तुम्हें कयामत के आने तक,
यूं मुझे छोड न दो भंवर में धारा बनकर।

जिधर भी देखती हूं तू ही तू नज़र आये,
मैं सबको देखती हूं तेरा नाज़ारा बनकर।

तेरे ही इश्क में क्या-क्या नहीं मैं सहती हूं,
मैं हर घडी से गुजरती हूं अंगारा बनकर।

मेरी सांसों की नैया डूबती भंवर में सनम,
कि अब तो आके बचा ले तू किनारा बनकर ।

तेरे लिए तो हमने इस जहां को छोड दिया,
कि अब तो दर्श दिखा कोई सितारा बनकर।

डा. रमा द्विवेदी

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September 26, 2006 - Posted by ramadwivedi | गीत | | 4 Comments

4 Comments »

  1. बहुत खुब

    Comment by संजय बेंगाणी | September 26, 2006

  2. बहुत बढिया - मगर ये क्या आपकी पूरी पोस्ट जैसे लिंक टैग मे लगी है

    Comment by SHUAIB | September 26, 2006

  3. har sher bhut acha lagaa. dil ko chu saa gya.

    Comment by hemjyotsana parashar | August 8, 2007

  4. Bahut bahut shukriyaa Jyotsana jee.

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | August 9, 2007

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