Rama Dwivedi: Each One?s Truth

Translated from Hindi by Elizabeth Kurian ?Mona?

Each One?s Truth

Truth is truth,
Even falsehood in itself
is a reality;
Each one has to live out
his own truth;
Truth is neither good nor bad,
human beings make it so.

The truth of modern life
has scattered in pieces;
From top to bottom,
from big to small, who are they
whose falsehood is not their truth?
All are engrossed in
living their truth;

Like a spider?s web,
none can escape from his truth.
You have created your own chakravyuh,
now you cannot break free from it.
Does Arjun have to arrive
to pierce this chakravyuh of truth?
Until then, await his arrival,
bear your torment.
This is of your own making,
not bestowed by anyone else.

Pick up the pieces of truth,
collect them within yourself,
Churn out poison and nectar
and you will behold the truth.
Don?t live life in fragments,
live it in totality,
In this is the immortality of life
and the joy of the world.

Dr. Rama Dwivedi

Hindi Version

सत्य अपना अपना

सत्य, सत्य है
झूठ भी अपने आप
में
सत्य है।
सबको अपना सत्य,
स्वयं ही जीना
पड,ता है।
सत्य अच्छा या
बुरा
होता नहीं,
उसे रूप देता है
इन्सान ।
आधुनिक जीवन का
सत्य,
टुकडों-टुकडों
में बžंट गया है।
उपर से नीचे तक,
बडे से छोटे तक ,
कौन हैं वे?
जिनका झूठ, उनका
सत्य न हो।
सभी अपने सत्य को
जीने में उलझे
हैं,
मकडी के जाल जैसा
,
नहीं निकल पाता
कोई,
अपने सत्य से ।
स्वयं ही तो रचा
था ,
सत्य का
चक्रब्यूह,
अब नही भेद पाते
इसे,
आना पडेगा फ़िर
किसी अर्जुन को ?
सत्य का
चक्र्ब्यूह भेदने के
लिए
तब तक करो
इन्त्जार,
सहते रहो खुद क
संताप,
यह तुम्हारा
अपना है,
किसी ने दिया
नहीं ।
समेट लो टुकडे,-
टुकडे सत्य को
समाहित कर लो
अपने अन्दर ,
विष अमिरत के
घूंट,
मंथन करो स्वयं
ही,
सत्य के दर्शन पा
जावोगे।
बिखर- बिखर कर
जीना छोडो,
पूर्णता में
जिवो,
इसी में जीवन की
अमरता है,
और
संसार का सुख भी

डा. रमा द्विवेदी

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Rama Dwivedi’s Profile

Dr Rama Dwivedi, poet and writer, has a Ph D in Hindi, and has taught as Hindi lecturer at GSM College for Women, Secunderabad. De Do Aakaash is an anthology of her Hindi poems. She has also published her work in magazines like Kadambini and Bhasha of New Delhi, Dakshin Samachar and Hindi Milap of Hyderabad, Himalini of Kathmandu, Swatantra vartaa,HYD. Sankalya, HYD, Yugeen, NOIDA,Pushpak, HYD.Shravanti,HYD. Aalekh samvaad, New Delhi and  E Magazine like Anubhuti org,Sahitya kunj, E Vishva,Hindi Nest,kavita kosh,E kavita,poetry Hindi, Anubhuti, Nai Subha,Sharma home  etc. She was editor of Kavita 2004 of AIPC and at present she is Editor of “Pushpak”, Kadambini Club, Hyderabad. She is recipient of “Subhadra Kumari Chauhan” Award  at All India Poetess Conference, 2004  and “Vidya Martand” Award, Bharteeya sanskruti Nirman Parishad, Hyderabad,2006. She is a member of Authors Guild of India , Kadambini Club, Hyderabad,Nominated membar of All India Poetess Conference, Sankaly,Yugeen,Dakshin samachar etc.She was co-convenor of All India Poetess Conference,2004 and State Incharge of Andhra Pradesh,of AIPC,2005.Her poems and Articles are broad casted from Door Darshan,Hyd.and All India Radio, Hyd.

Blog:   http://ramadwivedi.wordpress.com (Anubhuti Kalash)

She can be contacted at ramadwivedi@yahoo.co.in
  Phone # -040-23404051
    Cell #- 9849021742

  

 

 

परिभाषाएं अलग-अलग

       हर एक के सुख की परिभाषाएं अलग होती हैं,
       सभ्यता का पाठ पढानें वाली पाठशालाएं अलग होती हैं।
        अनुभव प्राप्त करने की कार्यशालाएं अलग होती हैं,
       जो प्रेम में सराबोर कर दें,वे मधुशालाएं अलग होती हैं॥

        कोई अध-छलकत गगरी बन इतराता है,
       कोई आसमां को छूकर भी झुक जाता है।
        कोई दूसरों को मिटा करके सुख पाता है,
       कोई दूसरों को बसाने में मिट जाता है॥

        कोई सुख-सुविधाओं में रम जाता है,
       कोई दौलत कमाने में खट जाता है।
        कोई आत्म्सम्मान लुटा करके कुछ पाता है,
       कोई आत्म्सम्मान बचाने में मिट जाता है॥

        कोई खुश है परिश्रम की रोटी कमाकर,
       कोई खुश है हराम की कमाई पाकर।
        कोई खुश है बैंक बैलेन्स बढाकर,
       कोई खुश है अपनी पहचान बनाकर॥

       डा. रमा द्विवेदी

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रिश्ते भी मुरझाते हैं

         पल-पल रिश्ते भी मुरझाते हैं,
         उम्र बढते-बढते वे घटते जाते हैं।
          मानव कुछ और की चाह बढाते हैं,
         इसलिए वे कहीं और भटक जातेहैं॥

           रिश्ते का जो पक्ष कमजोर है,
         समय उसको ही देता झकझोर है।
          अतीत की गवाही नहीं चलती वहां,
         मानव सुख की पूंजी का जमाखोर है॥

          मानव एक रिश्ते को तोड,दूसरे को अपनाता है,
         अब तक के सारे कसमें-वादे भूल जाता है।
          मानव से अधिक स्वार्थी न कोई होगा जहां में,
         अपनी तनिक खुशी के लिए वो दूसरों के घर जलाता है॥

         डा.रमा द्विवेदी 

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तम को बाहर करना है

       अमावस की रात्रि जैसा,
       अंतस में अंधकार का धरना है।
       ग्यान का दीप जला करके,
       इस तम को बाहर करना है॥

       बुराई पर हुई सत्य की विजय,
       यह दीपमालिका कहती है।
       कभी सहो न अत्याचार को,
       जलती दीपशिखा यह कहती है॥

       दरिद्रता की पीठ पर बैठ ,
       मानव, पूजन लक्ष्मी का करता है।
       होता है दरिद्र और भी वो,
       जो भाग्य भरोसे रहता है॥

        दीपशिखा यह सिखलाती,
        मानव तुमको जलना होगा।
        जल-जल कर,तप-तप कर,
        जीवन में प्रकाश भरना होगा॥

        पुरुषार्थ करोगे यदि मन से,
        लक्ष्मी स्वयं ही आयेंगी।
        कामनापूर्ण होगी तेरी ,
        फिर लौट कभी न जायेंगी॥

        अगर दीपावली मनाना हो,
        तो प्रेम के दीप जलाओ तुम।
        पी जाओ तमस विश्व का तुम,
        ऐसी दीपावली मनाओ तुम॥

        सच्ची दीपावली तो तब होगी,
        जब कोना-कोना उजला होगा।
        कमजोर हैं जो तन-मन-धन से,
        उनको भी आगे लाना होगा॥

        भारत का जन-जन जब,
        खुशियों से लहरायेगा।
        सही मायनों में तब ही,
        मानव, दीपवली मनायेगा॥

        डा. रमा द्विवेदी

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विदेश में अकेलापन

ज़िन्दगी है यहां गाडियों में बन्द,
गाडियां सडक पर तेज से तेज-
रफ़्तार में दौडती हैं।
सडक के किनारों पर लगे पेड,
बीच में सडक,
सडक पर सैकडों गाडियों की-
दौडती कतार,
हां कभी-कभी सिगनल पर-
कुछ पल रुकती हैं,
फ़िर तीव्र रफ़तार में दौडती हैं
अपने गन्तव्य की ओर-
रास्ते में हरी-भरी वादियों को पार करती हुई,
प्रकुति के अनुपम सौन्दर्य को -
नकारती हुई,
दौडती हैं ,सिर्फ़ दौडती हैं,
रुकती हैं अपने कार्यस्थल पर।
ज़िन्दगी भी यहां,
गाडियों की तरह है,
अपने आस-पास से अन्जान,
ज़िन्दगी का ध्येय यहां,
सिर्फ पैसा और काम,
मानव यहां कभी-कभी फ़ुटपाथ पर,
दिखाई देता है रेंगता हुआ,
गाडी के बिना यहां,
ज़िन्दगी जैसे अपाहिज हो,
कुछ नहीं हो सकता,कुछ भी नहीं हो सकता,
राह पर चलता मानव,
जैसे ग्लैमर के चकाचौंध में,
रास्ता भटक गया हो,
या कोई अजूबा हो,
अपने आप में खोया हुआ,
अपने आस-पास से बेखबर,
चला जा रहा है,चला जा रहा है,
लंबी सडक की तरह बेजान,
जो न गम करती है,
न प्रश्न पूंछती है,
कि मैं अकेली क्यों हूं?
मैं अकेली क्यों हूं??

 

डा. रमा द्विवेदी

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विद्यामार्तण्ड व राष्ट्र भारती पुरस्कार प्रदत्त

 

भारतीय संस्क्रिति निर्माण परिषद एवं रचनात्मक साहित्यिक शैक्षणिक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में नामपल्ली स्थित “पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगु विश्वविद्यालय के सभागार में विद्यामार्तण्ड एवं राष्ट्रभारती पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया।कार्यक्रम का आरंभ मां वीणा पाणि की वंदना एवं वंदे मातरम से हुआ। डा. वसुधा शास्त्री के द्वारा बहुत ही कुशल संचालन किया गया।
यहां जारी एक प्रेस विग्यप्ति के अनुसार इस अवसर पर स्व. श्री बाबूलालजी पाटौदी शैक्षणिक न्यास एवं स्टेट
बैंक आफ हैदरबाद के सौजन्य से एक संगोष्ठी भी आयोजित की गयी, जिसमें प्रो. दिलीप सिंह ने”भारतीय शिक्षा और राष्ट्र्भाषा हिन्दी का वैश्वीकरण” विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिन्दीभाषी समाज विश्व के अनेक देशों में फैला है तथा सौ से भी अधिक विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी सिखाने के लिए ३वर्ष से लेकर ५ वर्ष तक के पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस दशक में पत्रकारिता,अनुवाद,इलेक्ट्रानिक मीडिया, बाजारीकरण आदि के विस्तार के साथ-साथ हिन्दी का भी बडी तेजी से विस्तार हुआ है तथा इससे अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए अनुकूल वातावरण बना है।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डा.अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय के उप-कुलपति प्रो. डी रामचंद्रन एवं समारोह के अध्यक्ष डा. वाई.एस. रामक्रिश्न (निदेशक,केन्द्रीय बारानी अनुसंधान संस्थान) वक्ता माधव राव सोलंकी के अलावा विशेष अतिथि अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ,हैदराबाद प्रखण्ड की अध्यक्ष श्रीमती अर्चना सिंह ,डा. कनक भूषण ,हिन्दी प्रचार सभा हैदराबाद के न्यासी एम.प्रभू ,अधिवक्ता श्रीक्रिष्ण शर्मा आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर हिन्दी शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अनेकों शिक्षकों को विद्यामार्तण्ड पुरस्कार से नवाज़ा गया ।जिसमें डा. रमा द्विवेदी के साथ डा. श्यामला,डा.आर.एस.एन.शास्त्री,माधव राव सोलंकी,जे.प्रेम कुमार, एवं श्रीमती सीमा मिश्राको विद्यामार्तण्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।डा. दिलीप सिंह ,डा. देवीदास यश्वंत इंगले, डा.रिषभदेव शर्मा , नंदनम क्रिपाकर, प्रो. डी. रामचंद्रन एवं डा. वाई.एस. रामाक्रिष्ण को शिक्षा शिरोमणि पुरस्कार एवं सी. आर. रामचंद्रन डा. वाई.एन. राव,डा.एम. लक्ष्यमणाचार्य , डा. एन. नारायण रेड्डी, प्रमोद कुश ‘तन्हा’ ,ग्यानेश्वर पिल्लै,डा.जयकरण हीरेकार, डा. मोहन पिल्लै, ,संतराम यादव आदि को राष्ट्रभारती पुरस्कार प्रदान किया गया।
कार्यक्रम में कुछ आयोजकों एवं अतिथियों को भी सम्मानित किया गया जिनके नाम इसप्रकार हैं-हरिप्रसाद, राजकुमार सूबेदार,श्रीमती चारुशीला सूर्यवंशी,जगदीश्चंद्र सूर्यवंशी ,डा जी.वी.वी. एस. कनकभूषणम ,श्रीक्रिष्ण शर्मा, एम. प्रभु और प्रो. डी. रामचंद्रन को भी सम्मानित किया गय। कार्यक्रम के संस्थापक ,आयोजक डा. हरिश्चंद्र विद्यार्थी के धन्यवाद के पश्चात राष्ट्र्गान के साथ समारोह संपन्न हुआ।

सरजमीं से मुखातिब न होती

ये लंबे-मोटे-पतले पेड,
कुछ हरे-भरे,कुछ में है पतझड,
इन पेडों की ऊंचाई देख कर,
मैं सोचती हूं,
कितने वर्षों से ये पेड,
ऐसे ही खडे हैं ऊर्ध्वमुखी,
मुस्कराते,गुनगुनाते हुए,
इनका हाल कोई पूछता नहीं,
फिर भी कैसे जीवित हैं ये?
मैं इनकी ओर देखती हूं एकटक,
और सोचती हूं,
इन्हें जीवन-शक्ति मिलती है कहां से?
शायद अपनी सरजमीं से?
हां ऐसा ही है।
विदेश में अकेलापन मुझे ही,
क्यों कचोटता है?
गैरों की सरजमीं पर-
अपनी जडें जमाना,
लोहे के चने चबाने जैसा है,
या फिर निर्जीव बनकर जीना है,
अपना देश, अपने लोग,
अपने देश की आबोहवा,
अपने देश की मिट्टी की सुगंध,
बहुत कचोटती है मन को,
पेड बनकर जीना कितना सहज है?
काश! मैं भी एक पेड बन जाती,
तब मुझे भी किसी से,
शिकायत न होती ,
मोहब्बत न होती,तो यह तडपन न होती,
अगर मैं अपनी सरजमीं से मुखातिब न होती॥

डा. रमा द्विवेदी

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( अमेरिका प्रवास २००१ में लिखी गई कविता)

विदेश में अकेलापन

ज़िन्दगी है यहां गाडियों में बन्द,
गाडियां सडक पर तेज से तेज-
रफ़्तार में दौडती हैं।
सडक के किनारों पर लगे पेड,
बीच में सडक,
सडक पर सैकडों गाडियों की-
दौडती कतार,
हां कभी-कभी सिगनल पर-
कुछ पल रुकती हैं,
फ़िर तीव्र रफ़तार में दौडती हैं
अपने गन्तव्य की ओर-
रास्ते में हरी-भरी वादियों को पार करती हुई,
प्रकुति के अनुपम सौन्दर्य को -
नकारती हुई,
दौडती हैं ,सिर्फ़ दौडती हैं,
रुकती हैं अपने कार्यस्थल पर।
ज़िन्दगी भी यहां,
गाडियों की तरह है,
अपने आस-पास से अन्जान,
ज़िन्दगी का ध्येय यहां,
सिर्फ पैसा और काम,
मानव यहां कभी-कभी फ़ुटपाथ पर,
दिखाई देता है रेंगता हुआ,
गाडी के बिना यहां,
ज़िन्दगी जैसे अपाहिज हो,
कुछ नहीं हो सकता,कुछ भी नहीं हो सकता,
राह पर चलता मानव,
जैसे ग्लैमर के चकाचौंध में,
रास्ता भटक गया हो,
या कोई अजूबा हो,
अपने आप में खोया हुआ,
अपने आस-पास से बेखबर,
चला जा रहा है,चला जा रहा है,
लंबी सडक की तरह बेजान,
जो न गम करती है,
न प्रश्न पूंछती है,
कि मैं अकेली क्यों हूं?
मैं अकेली क्यों हूं??

डा. रमा द्विवेदी

पुनर्विवाह दंश (कहानी)

पुनर्विवाह दंश (कहानी)

लेखिका: डा. रमा द्विवेदी

छोटे से गांव में जन्मी पूर्नियां का विवाह नौ वर्ष की अवस्था मेंसतरह वर्षीय भगवानदस के साथ संपन्न हुआ था।पूर्नियां तो बस गहने-कपडे पाकर ही खुश थी।उस समय उसे विवाह का अर्थ भी मालूम न था । अपने नन्हें दोस्तों को अपने गहनें-कपडे दिखा कर वह बहुत खुश हो रही थी,जैसे उसे कोई अमूल्य निधि मिल गई हो। अल्पायु पूर्नियां को ससुराल नहीं भेजा गया।बारात वापस चली गई।
समय के जैसे पंख लग गए देखते ही देखतेपूर्नियां तेरहवें वर्ष में प्रवेश कर गई।शुभ मुहूर्त में उसके ससुराल वाले उसे विदा करवा कर ले गए।अनेक रीतिरिवाजों के साथ पूर्नियां का स्वागत हुआ और वह क्षण भी आ गया जब डरी सहमी सी उसने पति के चरणों में समर्पण कर दिया। ज़िन्दगी की दिनचर्या सहज रूप से चल रही थी ।दो वर्ष होते- होते पूर्नियां एक पुत्र की मां भी बन गई ।मां बनकर वह बहुत खुश थी ।
अभी एक वर्ष भी नहीं बीता था कि भगवानदास को ऐसा ज्वर चढा. कि फिर उतरा ही नहें ।घरेलू उपचार करते रहे क्योंकि छोटे से गांव में अस्पताल या डाक्टर नहीं था। उचित चिकित्सा के अभाव मेंउनकी म्रत्यू हो गई। पूर्निया पर मुसीबतों का पहाड टूट पडा। वह कई दिनों तक रोती-विलखती रही किन्तु जो सच था वह बदल नहीं सकता था। पूर्निया एक ही जगह पडी रहती ,उसका शरीर मानों स्पन्दनरहित हो गया हो। उसकी यह दशा देखकर सब यही कहते-”बेचारी की उम्र ही क्या है?पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा?” लोगों के शब्द उसके ह्रदय को छलनी कर देते। दूसरी चिन्ता उसे खाए जा रही थी कि जब घरवालों को उसके दो माह के गर्भ के बारे में पता चलेगा तब वे उसके साथ कैसा सलूक करेंगे?
जैसे-तैसे दिन काटने लगी।अपने को उसने यह समझा कर संभाल लिया कि बेटे के लिए तो जीना ही पडेगा। सास बेटे की म्रित्यु का दोष उसपर डाल रात-दिन कोसती प्रताडित करती कुलच्छिनी डायन मेरे बेटे को खा गई।वह खून के घूंट पीकर रह जाती,कुछ न कहती। अधिक श्रम का काम उससे करवाया जाता। उसस्के नन्हे से बेटे को भी बिना दूध की बासी रोटी खाने को दी जाती। जी-तोड मेहनत के बावजूद भी उसे बचा-खुचा खाना ही दिया जाता। वह उसे ही अपने बच्चे को खिला कर खुद खाती और संतुष्ट हो जाती। उसके दुखों का अन्त यहीं हो जाता तो अच्छा होता किन्तु भाग्य को किसने देखा है?
उसकी सास बडी ही दुष्ट और कर्कशा स्त्री थी। विधवा थी,किसी का अंकुश उस पर नहीं था।दिन्प्रतिदिन वह उसपर जुल्म ढाने लगी। ऐसी ही कठिन परिस्थितियों में एक दिन उसने सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।सूतक में भी पुर्नियां की सही देखभाल नहीं हुई। सास को उसपर दया नहीं आईऔर उसका दुर्व्यवहार जारी रहा।
पुर्नियां की सहन शक्ति चुक गई थी।प्रतिदिन की कलह से तंग आकर उसने अपने पिता को बुला भेजा और अलग रहने की इच्छा प्रगट की।पिता ने पंचों को जमा करके पुर्नियां को जायदाद में हिस्सा देने की बात रखी किन्तु उसकी सास ने हिस्सा देने से साफ मना कर दिया। उसकी गांव में बडी धाक थी या यह कहिए कि पंच भी उसके खिलाफ नहीं जा सकते थे। बहुत समझाने पर एक कमरा और प्रतिदिन के हिसाब से एक सेर अनाज और एक कटोरी दाल्देने के लिए वह रजी हुई। इतने में दो बच्चओं क,पिता और खुद का खाना भी नहीं चलता था।फिर अन्य खर्च ? वह घर में रहकर लोगों का पीसना कूटना करके देने लगी। जैसे-तैसे दिन गुजरने लगे। बूढे पिता से बेटी का दुख देखा न गया ऊपर से सास आते जाते खरीखोटी सुना ही जाती।
एक दिन पिता ने कहा-”तुम मेरे साथ चलो,मैं वहीं तुम्हारा प्रबन्ध कर दूंगा”।
पूर्नियां के माता-पिता और भाईउसकी नि:संतान मैसी के घर रहते थे।मौसी का अलग रुत्बा था। उनकी बात और जबान अत्यधिक कटु थी। यहां आकर पूर्नियां को कुछ स्वतन्त्रता तो अवश्य मिल गई किन्तु मेहनत करके ही जीना था अत:वह अपने पडोसी शिवशंकर से एक छोटी सी कोठरी मांगकर एक छोटी सी दुकान खोल ली।कोसो चल कर सामान लाती और बेंचती।इस तरह कडी मेहनत करके अपने ब्च्चों की परवरिश करने लगी।
शिवशंकर स्वतन्त्रता सेनानी थे।कभी जेल जाते तो कभी छूट जाते इसलिए उम्र हो जाने पर भी कुंवारे थे।बचपन से ही वे पूर्नियां को चाहते थे। एक दिन जब वे जेल से छूट कर आए तो वे पुर्नियां के कष्टों को देख कर द्रवित हो गए। मन ही मन उन्होंने उसे अपनाने का संकल्प कर लिया।उसे अपने विश्वास में लेने का प्रयत्न करने लगे और पूर्नियां भीन जाने किस आकर्षण के वशीभूथोकर उनकी ओर खिंची चली गई और एक दिन मर्यादा की सीमाएं टूट गईं।
पूर्नियां चिन्तित रहने लगी कि अगर किसी को पता चलाकि वह गर्भवती हैतो उसके भाई-बाप उसे जिन्दा ही ज़मीन में गाड. देंगे। इसी चिन्ता में घुली जा रही थी कि उसके बच्चों राम और श्याम का क्या होगा? तभी एक दिन किसी ने उसकी मौसी को किसी ने बता दिया कि वह गर्भवती है। अब क्या था? क्षण भर में घर में भूचाल आ गया। उसके बडे भाई ने उसे बहुत मारा-पीटा और घर से निकाल दिया। बच्चे भी चीन लिए।वह अभी सोच ही रही थी कि वह क्या करे? कहीं जाकर मर जाए? या कहीं चली जाए?लेकिन कहां जाए?अपना कोईनहीं था?मरने की हिम्मत वह जुटा नहीम पा रही थी। तभी शिवशंकर वहां आएऔर उसे बाइज्जतपने घर ले गए और भगवान को साक्षी मान कर विवाह कर लिया।
पूर्नियां को इस विवाह से एक सुद्रुढ. सहारा तो मिल गया किन्तु मानसिक धरातल पर वह विक्षिप्त रहने लगी। समाज उसे हेय द्रिष्टी से देखता था। वह एक वर्ष तक नज़रबंद होकर रह गई। बच्चों की याद में वह छटपटाती और अपने आप को कोसती। इस गम ने उसे अनदर से तोण्ड दिया। अपना सारा आक्रोश वह शिवशंकर पर ही उतारती। वे सह लेते कि कभी तो घाव भर जाएंगे और यह नार्मल हो जाएगी।
शिवशंकर अक्सर राजनीति के कार्यों में उलझे रहते। समाज में उनका सम्मान था इसलिए समाज की उपेक्षा का दंश उन्हें नहीम झेलना पडा। सच तो यह था पूर्नियां को अपना कर उनमें कोइ हीन भावना भी नहीं आई थी लेकिन पूर्नियां स्त्री थी और मां भी। उसकी आन्तरिक कुढ.न और घुटन बढती ही गई।
एक दिन उसने एक पुत्र को जन्म दिया।शिवशंकर खुशी से फूले न समाए। पुत्र का नाम रखा उमाशंकर।पूर्नियां को इस पुत्र के जन्म पर खुशी कम उन बिछुडे पुत्रों का गम अधिक था।सबसे बडी विडम्बना यह थीकि वे सामने के घर में ही रहते थे। वह उन्हें देखने के लिए घंटों दरवाजे की ओट में खडी रहतीकिन्तु न जाने वे कहां छुप जाते कि दिखई ही न देते। यह दु:ख उसे घुन की तरह खाए जा रहा था। वह हमेशा यही सोचती उसने पुनर्विवाह क्यों किया?कैसे वह कलेजों के टुकडों को अलग कर सकी? उसे यह सुख भोगने का कोई हक नहीं ? उसकी इसी घुटन ने उसे मानसिक रूप से बिमार बना दिया।
धीरे-धीरे समाज से उसका संपर्क बढा। उसकी बचपन की एक सहेली थी’कमली’।उसके भी दो बच्चे थेऔर जवानी में ही वह विधवा हो गई थी किन्त माता-पिता की इक्लौती संतान होने के कारण सुखपूर्वक जीवन बिता रही थी। उसने दूसरी शादी तो नहीं की किन्तु अपनी आवश्यकताओंकी पूर्ति अन्य तरीकों से की और बहुत बदनाम भी हो गई। उसए देख कर पूर्नियां को कुछ संतोष होता कि उसने जो किया है,खुलेआम किया हैऔर एक ही व्यक्ति से किया हैकिन्तु उसका विवेक ज्यादा देर तक न रहता और भावना प्रबल हो जाती।
राम और श्याम किशोरावस्था में पहुंच गए। राम त्प शान्त प्रकित का था किन्तु श्याम मां के प्रति विद्रोही बन गया। वह मां को खुलेआम गालियां देता,घर में पत्थर फेंकता और तरह तरह से नुकसान पहुंचाने की योजनाएं बनाता। बेटे का विद्रोही रूप देखकर वह अन्दर से टूटती गई और सदैव स्वयं को ही दोषी पाती।
श्याम की शादी हो गई। विवाह के तीसरे वर्ष वह बेटे का पिता भी बन गया। अभी विवाह चार वर्ष पूरे भी नहीं हुए थे कि अचानक हार्ट-अटैक से श्याम की म्रित्यु हो गई। मां की ममता हाहाकार कर उठी। गिरती-पडती बेटे के पास पहुंची किन्तु बहू बहुत दुष्ट थी उसने उसे दरवाजे पर ही दुत्कार दिया। वह अपमानित होकर भी उनकी देहरी पर बैठकर रोती रही। सुबह बेटे की अर्थी उठते वह फूट-फूट कर रो पडी। बेटे के अंतिम दर्शन के लिए अर्थी के पास गई,लेकिन निर्दयी बहू ने उसे दूर ढकेल दिया। बेटे की म्रित्यु का गहरा आघात उसे पहुंचा। सामने जवान बहू और एक वर्ष का पोता? वह सोचती बहू का पहाड जैसा जीवन कैसे कटेगा? वह भी तो उसके साथ नहीं रहती।वह क्या करे? कैसे उसकी मदद करे?उसने पुनर्विवाह क्यों किया? उसे जीने का हक नहीं है।इतना बडा सदमा वह कैसे सह सकी? अनेकानेक ऐसे प्रश्न थे जो उसके मस्तिष्क को झंझोरते रहते। वह इन प्रश्नों से जूझती जिन्दा लाश की तरह रहने लगी।
इधर उमाशंकर की भी शादी हो गई। पूर्नियां के मन में एक कुंठा घर कर गई कि उसने पुनर्विवाह करके ठीक नहीं किया। इसी दर से वह अपनी बहू का अतिरिक्त ख्याल रखती किन्तु बहू थी दुष्ट। वह अपने पति से उनकी शिकायतें करके मां बेटे को लडवाती। इससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पडा और उसे पित्ताशय का कैंसर हो गया। शीघ्र ही इलाज के अभाव में शरीर जर्जर हो गया और एक दिन वह तमाम कष्टों एवं कुंठाओं से घिरी चिर निद्रा में लीन हो गई। उसके शान्त और सौम्य चेहरे को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह वह अपने जीवन के तमाम कष्टों से मुक्ति पा गई है।*********