अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

सरजमीं से मुखातिब न होती

ये लंबे-मोटे-पतले पेड,
कुछ हरे-भरे,कुछ में है पतझड,
इन पेडों की ऊंचाई देख कर,
मैं सोचती हूं,
कितने वर्षों से ये पेड,
ऐसे ही खडे हैं ऊर्ध्वमुखी,
मुस्कराते,गुनगुनाते हुए,
इनका हाल कोई पूछता नहीं,
फिर भी कैसे जीवित हैं ये?
मैं इनकी ओर देखती हूं एकटक,
और सोचती हूं,
इन्हें जीवन-शक्ति मिलती है कहां से?
शायद अपनी सरजमीं से?
हां ऐसा ही है।
विदेश में अकेलापन मुझे ही,
क्यों कचोटता है?
गैरों की सरजमीं पर-
अपनी जडें जमाना,
लोहे के चने चबाने जैसा है,
या फिर निर्जीव बनकर जीना है,
अपना देश, अपने लोग,
अपने देश की आबोहवा,
अपने देश की मिट्टी की सुगंध,
बहुत कचोटती है मन को,
पेड बनकर जीना कितना सहज है?
काश! मैं भी एक पेड बन जाती,
तब मुझे भी किसी से,
शिकायत न होती ,
मोहब्बत न होती,तो यह तडपन न होती,
अगर मैं अपनी सरजमीं से मुखातिब न होती॥

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

( अमेरिका प्रवास २००१ में लिखी गई कविता)

October 7, 2006 - Posted by ramadwivedi | संवेदना की अनुभूतिय | | 3 Comments

3 Comments »

  1. अपना देश, अपने लोग,
    अपने देश की आबोहवा,
    अपने देश की मिट्टी की सुगंध,
    बहुत कचोटती है मन को,
    पेड बनकर जीना कितना सहज है? ……….

    विचार प्रधान रचना है. बहुत अच्छी ।

    Comment by Prabhakar Pandey | October 7, 2006

  2. सुन्दर है।

    Comment by ratna | October 8, 2006

  3. बहुत सुंदर, बधाई.

    Comment by समीर लाल | October 12, 2006

Leave a comment