तम को बाहर करना है
अमावस की रात्रि जैसा,
अंतस में अंधकार का धरना है।
ग्यान का दीप जला करके,
इस तम को बाहर करना है॥बुराई पर हुई सत्य की विजय,
यह दीपमालिका कहती है।
कभी सहो न अत्याचार को,
जलती दीपशिखा यह कहती है॥दरिद्रता की पीठ पर बैठ ,
मानव, पूजन लक्ष्मी का करता है।
होता है दरिद्र और भी वो,
जो भाग्य भरोसे रहता है॥दीपशिखा यह सिखलाती,
मानव तुमको जलना होगा।
जल-जल कर,तप-तप कर,
जीवन में प्रकाश भरना होगा॥पुरुषार्थ करोगे यदि मन से,
लक्ष्मी स्वयं ही आयेंगी।
कामनापूर्ण होगी तेरी ,
फिर लौट कभी न जायेंगी॥अगर दीपावली मनाना हो,
तो प्रेम के दीप जलाओ तुम।
पी जाओ तमस विश्व का तुम,
ऐसी दीपावली मनाओ तुम॥सच्ची दीपावली तो तब होगी,
जब कोना-कोना उजला होगा।
कमजोर हैं जो तन-मन-धन से,
उनको भी आगे लाना होगा॥भारत का जन-जन जब,
खुशियों से लहरायेगा।
सही मायनों में तब ही,
मानव, दीपवली मनायेगा॥डा. रमा द्विवेदी
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रमा जी
शीर्षक “तुम को बाहर होना चाहिये था शायद.” क्या सही कविता लिखी है. शीर्षक की मात्रा छोड़ के बकिया कविता चकाचक है.
मेरे हिसाब से तो ‘तम’ ही होना चाहिए था. यानी अंधकार को बाहर करना हैं. अब आपको (तुमको) यानी घर आए मेहमान को भला क्यों बाहर करेंगे. आओगे तो टिप्पणी टिका कर ही जाओगे ना.
रमा जी
कविता बहुत सुंदर है.
आपको भी दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनायें.
भारत का जन-जन जब,
खुशियों से लहरायेगा।
सही मायनों में तब ही,
मानव, दीपावली मनायेगा॥
-क्या खूब लिखा है रमा जी,
आपको भी दिवाली मुबारक हो।
जीतू भाई,
“तम को बाहर करना है” आपने गलत समझा है “तुम” नही है।”तम” का मतलब ‘अंधेरा’ होता है।जो अग्यान का अंधकार हमारे अंदर है उसे दूर करना है।उम्मीद है कि अब आप को समझ में आ गया होगा।
अपनी गलत राय देकर मेरी तो धज्जियां उडा दी।दुख हुआ। क्रिपया अर्थ का अनर्थ न करें यह मेरी गुजारिस है।
सस्नेह,
डा. रमा द्विवेदी
संजय जी,
आपने यह कैसे समझ लिया कि मैं मेहमानों भगा दूंगी। आपने तो मेरी कविताएं पहले भी पढी हैं फिर भी शंका की गुंजाइस क्यों है?मैं यह नहीं समझ पाई। मेहमान तो मेजबान को ही भगाने में लगे हैं
“तम” है ‘तुम ‘नहीं।इसका अर्थ होता है “अंधेरा”। अपने अंदर जो बुराईयों का अंधकार है उसे दूर करने की बात कर रही हूं।
दीपावली की अनन्त शुभकामनाएं….
सस्नेह,
डा. रमा द्विवेदी
Rama ji,
Ye upar wali comment meri nahi hai.
Koi bahrupiya mere naam se comments kar raha hai.
Maine pahle bhi, sabko chetaya tha, koi bhi mere naam se comment dikhe, usko mere se varify jaroor kar leejiye.
dhanyavad
रमा जी आपको दिवाली की शुभकामनाएँ - और आपकी ये कविता बहुत पसंद आई।
दरिद्रता की पीठ पर बैठ ,
मानव, पूजन लक्ष्मी का करता है।
होता है दरिद्र और भी वो,
जो भाग्य भरोसे रहता है॥
आपकी ये दमदार कविता बहुत ही पसंद आई ।
दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ ।