अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

पीड़ा को विश्व का साम्राज्य दो (गीत)

    जाओ हवाओ देश प्रिय के, विरह के गीत गाओ तुम,
     जाओ घटाओ जाओ जाओ,विरहाग्नि न भडकाओ तुम।

      इस विरह के ताप से जर-जर के मैं ठठरी भई,
     श्वास यूं तो चल रही पर श्वास अनगिन चुक गई।
      झर रहे हैं अश्रु आंखों से उन्हें बतलाओ तुम॥

      दिन-रात में अन्तर नहीं इक से मुझे दोऊ लगे,
     दिन में अंधेरी रात है और रात में तारे गिने।
      मेघों ने पी चांदनी ली,चांद को बतलाओ तुम॥

      गीली-सुलगती लकडी सी यह रात भी जल गई,
     रात से सुबह हुई फिर शाम में वो ढल गई।
      जल रहा है तन-बदन प्रिय को जरा बतलाओ तुम॥

      इस विरह की अग्नि में देखो दिवाकर जल गया,
     चांद झुलसा,श्वेत बादल आज काला पड गया।
      कर रहा पीऊ-पीऊ पपीहा स्वाति-घन बरसाओ तुम॥

      इस विरह की पीड़ा को तुम विश्व का साम्राज्य दो,
     सब जुडे बस दर्द से तब मानव का कल्याण हो।
      साथ सब रोएं-हंसे सबको जरा समझाओ तुम॥

      डा. रमा द्विवेदी

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November 1, 2006 - Posted by ramadwivedi | गीत | | 4 Comments

4 Comments »

  1. पीड़ा को बखुबी शब्दो में ढ़ाला हैं आपने.
    विरह गीतो में राजस्थानी लोकगीतो का कोई मुकाबला नहीं है, यह भी उनके काफी निकट का लग रहा है.

    Comment by संजय बेंगाणी | November 1, 2006

  2. ओ हवाओ ओ देस पी के जाओ तुम
    मेरे इन बहते नयन से होड़ न लगाओ तुम
    ज़िन्दगी के अर्थ बदले ये उन्हें बतलाओ तुम
    और फिर उनकी गली में गीत मेरे गाओ तुम

    Comment by राकेश खंडेलवाल | November 2, 2006

  3. वाह, क्या उदगार हैं विरह पीड़ा के. बहुत सुंदर और यथार्थ के आस पास.

    Comment by समीर लाल | November 2, 2006

  4. संजय जी, राकेश जी एवं समीर जी ,

    रचना आप सबको भा गई…आप सब के स्नेह के लिये ह्रिदय से आभारी हूं…..सादर….

    डा. रमा द्विवेदी

    Comment by ramadwivedi | May 3, 2007

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