अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

मुक्तक

 १-     टेस्ट-ट्यूब बेबी तो अभी जन्में है,
         ये बनावटी लोग कहां से आते हैं?
         बनावटी चेहरों की नकल करते -करते,
         असली चेहरा ही भूल जाते हैं।

   २-   चेहरे पर सच्चाई का नूर नहीं,
       बेईमानी का लबादा है।
        झूठ में रात-दिन गुजारते हैं,
       पूरा करते नहीं अपना वादा है॥

   ३-  क्या हुआ गर हम आपके अज़ीज नहीं,
       हम भी इंसान हैं हम दिल के गरीब नहीं।
        इंसानियत अभी जिन्दा है,दिल की मरीज़ नहीं,
       चले सब साथ-साथ क्या कोई तरकीब नहीं॥

   ४-   छोटी सी ज़िन्दगी में झगडा है किस बात का?
       प्यार से हम सब रहें संकल्प लें इस बात का।
        बांट लें सुख-दुख सबके जीवन के दिन रात का,
       क्यों नहीं जुड पाते हम,प्रश्न है इस बात का॥

        डा. रमा द्विवेदी

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November 12, 2006 - Posted by ramadwivedi | संवेदना की अनुभूतिय | | 4 Comments

4 Comments »

  1. रमाजी बढ़िया लिखा है
    बधाई

    Comment by bhuvnesh | November 12, 2006

  2. बहुत सुन्दर.
    पहला तथा अंतिम मुझे खाश पसन्द आए.

    Comment by संजय बेंगाणी | November 13, 2006

  3. बढ़िया है, बधाई.

    Comment by समीर लाल | November 13, 2006

  4. bhoot achhe davi ji aap dil se likhti he

    Comment by rakesh jain | November 13, 2006

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