अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

हर ज़ाम छलकता है तेरे नाम ।

    ढलती शाम,मचलता चांद,
    छलकता ज़ाम, तीनों ही तेरे नाम।

    धीरे-धीरे चांदनी का उतरना,
    रात का बहकना,दिल का न संभलना,
    हर सांस लाती है तेरा पैगाम
    तीनों ही तेरे नाम……..

    हर शाम मैं महफ़िल सजाता हूं,
    मधुशाला से मधु चुन-चुन मंगाता हूं,
    हर ज़ाम छलकता है तेरे नाम ।
    तीनों ही तेरे नाम……..

    ज़ाम ही ज़ाम पीता हूं,गम में भी जीता हूं,
    ये मुकद्दर सब कुछ दिया तूने मुझे,
    न कर सका इक हमसफ़र का इन्तज़ाम।
    तीनों ही तेरे नाम………

    अब तो मेरा जीवन ही मयखाना हो गया है,
    इस मयखाने का साकी कहीं खो गया है,
    जीने की चाह जगाता है तेरा नाम।
    तीनों ही तेरे नाम………..

     डा. रमा द्विवेदी

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November 29, 2006 - Posted by ramadwivedi | संवेदना की अनुभूतिय | | 1 Comment

1 Comment »

  1. aaj hi aapka blog dekha. jo bhi padha hridayasparshi hai. jaanti hun baar baar yahan vapas aaney ko munn hoga.

    Comment by neelam | November 29, 2006

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