ढलती शाम,मचलता चांद,
छलकता ज़ाम, तीनों ही तेरे नाम।धीरे-धीरे चांदनी का उतरना,
रात का बहकना,दिल का न संभलना,
हर सांस लाती है तेरा पैगाम
तीनों ही तेरे नाम……..हर शाम मैं महफ़िल सजाता हूं,
मधुशाला से मधु चुन-चुन मंगाता हूं,
हर ज़ाम छलकता है तेरे नाम ।
तीनों ही तेरे नाम……..ज़ाम ही ज़ाम पीता हूं,गम में भी जीता हूं,
ये मुकद्दर सब कुछ दिया तूने मुझे,
न कर सका इक हमसफ़र का इन्तज़ाम।
तीनों ही तेरे नाम………अब तो मेरा जीवन ही मयखाना हो गया है,
इस मयखाने का साकी कहीं खो गया है,
जीने की चाह जगाता है तेरा नाम।
तीनों ही तेरे नाम………..डा. रमा द्विवेदी
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हर ज़ाम छलकता है तेरे नाम ।
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aaj hi aapka blog dekha. jo bhi padha hridayasparshi hai. jaanti hun baar baar yahan vapas aaney ko munn hoga.