December 28, 2006 at 4:48 pm (गीत)
सभी महानुभावों को मेरी ओर से नववर्ष की अनन्त शुभकामनाएं
बस ऐसा यह नूतन वर्ष हो,
जन-जन के मन में हर्ष हो।
रोटी प्रथम हलधर को मिले,
न भूख से अब कोई मरे,
सब बांट कर खाएं-पिएं,बस,
जीवन का ये ही धर्म हो॥
आओ करें संकल्प सब
बंधुआ न अब बचपन रहे,
खेलें-पढें,गाएं-हंसें,
उनके भी मन में हर्ष हो॥
स्त्री-भ्रूण हत्या बंद हो,
सांसों से इक अनुबंध हो,
जीने का हक उसको मिले,
जीवन का तब उत्कर्ष हो॥
त्योहार का रंग प्रेम हो,
रिश्तों में बस विश्वास हो,
जीवित रहे चिर-मानवता,
जीवन का यह संकल्प हो॥
तम-तमस का नाश हो,
बस ग्यान का प्रकाश हो,
ओढे चुनर धानी धरा,
धरती पे उतरा स्वर्ग हो॥
बस ऐसा नूतन वर्ष हो,
बस ऐसा नूतन वर्ष हो।
डा. रमा द्विवेदी
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December 24, 2006 at 5:39 am (संवेदना की अनुभूतिय)
चांद पर ज़मीन खरीदने लगे हैं लोग,
चांद पर रहने का इन्तज़ाम करने लगे हैं लोग,
इक्कीसवीं सदी में मानव चांद पर-
सैर-सपाटे के लिए जायेगा,
सारे काम यंत्र करेंगे,
मानो मानव यंत्रमय हो जायेगा।
न संगिनी की खटपट,
न रोटी कमाने का चक्कर,
चक्कर लगाते-लगाते वह,
आज की राजनीति का अधिवेशन,
मंगल पर जा करेगा,
चुनावी रणनीति वहीं पर तै करेगा।
वहां पर बैठे-बैठे वह,
सब कुछ हजम कर जायेगा,
और तो और जनता के
आक्रोश से भी बच जायेगा।
कई क्लोनिंग जीव वहां नज़र आयेंगे,
इस विचित्र माइक्रो दुनिया में,
कोई हिटलर, कोई लादेन,
कोई सफेदपोश रावण,
जो वहां से भी सीता का-
हरण कर ले जायेगा ।
सबसे पहले सफेदपोश जीव ही,
वहां आवास बनायेगा,
चक्कर काटने में हैं वे निपुण,
इसलिए चांद की सैर करवाने का,
ख्वाब जनता को दिखायेंगे,
जनता है बावरी ,
ऐसे नेता को ही जितायेंगे ॥
डा. रमा द्विवेदी
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December 20, 2006 at 5:03 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
१- चाहे कितना ही बड़ा हो,
पौरुष तुम्हारा ।
मेरे अस्तित्व के अंक में आ,
शान्त होता है अहं तुम्हारा॥
२- अपनी पीड़ा को पीकर भी,
मैं प्यार तुम्हें देती हूं।
अपना सब कुछ खोकर भी,
हर पल छांव तुम्हें देती हूं॥
३- सदियों से नारी विलख रही,
चाहे पहना हो कितना ही गहना ?
आत्मा जब उसकी बनी है बंदी,
फिर गहने पहन के क्या करना?
४- युग बदला,सब बदल गया,
गहनों की अब चाह रही ना।
दिल का सुकून जरूरी है,
अन्तस की हंसी है अब मेरा गहना॥
५- यूं तो कई रिश्ते हैं नारी के साथ,
पर नारी के लिए हैं सब बेकार।
अपने ही उसकी आत्मा का हनन कर रहे,
कैसा है यह संबंधों का साम्राज्य?
डा. रमा द्विवेदी
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December 11, 2006 at 9:43 am (संवेदना की अनुभूतिय)
प्रेयसी का आज बादल उम़ड रहा है।
उसके ही आस-पास पौरुष सिमट रहा है॥
संकीर्णता विचारों की इस क़दर ब़ढने लगी है।
जाने-पहचाने चेहरों में ही वो सिमटने लगी है॥
मोह का कोहरा कुछ इस क़दर छाने लगा है।
इंसान जहां से बौना नज़र आने लगा है॥
इक्कीसवीं सदी में मानव कुछ ऐसा क़हर ढ़ाएगा।
चांद तो क्या वो धरती से भी उख़ड जाएगा॥
डा. रमा द्विवेदी
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December 11, 2006 at 9:20 am (संवेदना की अनुभूतिय)
देशों का सरताज़ अमेरिका,
प्रगति का अंबार अमेरिका,
अस्त्रों का भंडार अमेरिका,
प्रक्रति का मणिहार अमेरिका।
यहां मानव है पर समाज नहीं,
संबंध हैं पर विश्वास नहीं,
दिलों में प्यार की चाह है,
पर उसमें मिठास नहीं।
व्यावहारिकता रिश्तों का आधार है,
औपचारिकता यहां का शिष्ठाचार है,
सरलता,ईमानदारी सबसे बडी नियामत है,
हेलो,गुड्मार्निंग,थैंक्स ही सबसे बडा प्यार है।
सब कुछ यहां यंत्रवत है,
प्यार ,व्यापार में अंतर नहीं,
रिश्ते अटूट बंधन में बंधें,
यहां ऐसा कोई तंत्र नहीं।
स्वतंत्रता यहां का सबसे बडा उपहार है,
फैशन का यहां कोई न पारावार है,
कच्ची उम्र में”डेटिंग” करते हैं यहांं,
सबसे ज्यादा प्रचलित यह शिष्ठाचार है।
काश! यहां पर भी सामाजिकता होती,
तब किसी भी तरह की औपचारिकता न होगी,
सब अपने आप में डूबे हुए हैं यहां,
मानवता की ऐसी कमी कहीं देखी न होगी।
(अमेरिका प्रवास (२००१) के समय लिखी गई कविता )
डा. रमा द्विवेदी
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December 3, 2006 at 4:49 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
१- प्यार भी करते हो तुम तलवार की धार पर,
जान भी ले लेते हो प्यार के इन्कार पर।
बर्बरता का यह कौन सा सोपान है ?
खून की बेदी रचाते हो हमें तुम मार कर॥
२- भावनाएं घायल हुईं जब,
फिर जिस्म में था क्या बचा?
जिस्म के टुकडे किये फिर भी,
हैवानियत का यह कैसा नशा?
(यह मुक्तक उस समय लिखे थे जब मद्रास मे क्लास रूम मे दिनदहाडे एक लडकी की हत्या उसके तथाकथित प्रेमी ने कर दी थी)
३- सदियों से नारी विलख रही,
चाहे पहना हो कितना ही गहना?
आत्मा जब उसकी बनी है बंदी,
तब गहने पहन के क्या करना?
४- युग बदला ,सब बदल गया,
गहनों की अब चाह रही ना।
दिल का सुकून जरूरी है,
अन्तस की हंसी है अब मेरा गहना॥
डा. रमा द्विवेदी
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December 3, 2006 at 12:06 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
मेरे घर के चारो ओर हरियाली ही हरियाली है,
रंग-बिरंगे फूलों की सजी-धजी क्यारी है।
लोगों से कई गुना अधिक यहां फूल बेशुमार हैं,
पर जहां देखो वहां गाडियों की कतार है॥
घर में है बगीचा या बगीचे में है घर,
होता है मुझे भ्रम यह अक्सर।
पर मेरे मन में है पतझड,
यहां आदमी कम ही होता है द्रिष्टिगोचर॥
कितना दुख है अकेलेपन का यहां?
कितना इन्त्जार है किसी के होने का यहां?
मेरा मन तडपता है किसी से मिलने को यहां,
लडने-झगडने व रोने-हंसने को यहां॥
फूलों की ओर एकटक देखती हूं मैं,
कितने खुश हैं ये अकेले रह कर यहां?
मेरे मन में क्यों इतना गहरा अंधकार है?
क्यों मुझे किसी से मिलने का इन्तजार है?
अकेलापन मानव को दीमक की तरह खा जाता है,
आत्मीयता में मानव अद्रश्य शक्ति पाता है।
काश! मुझे भी यहां अपनेपन का अहसास होता,
मेरे मन का सुकून यहां यूं तो न खोता॥
डा. रमा द्विवेदी
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(अमेरिका प्रवास के समय लिखी गई कविता)
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December 2, 2006 at 12:20 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
‘प्रेम’ दिल की पुकार है,
ह्रिदय का विस्तार है,
स्वप्निल संसार है,
रस की फ़ुहार है,
तन-मन झूम जाता है,
गीत बन जाता है।
‘प्रेम’ जिजीविषा का विकास है,
जीवन का प्रकाश है,
अधरों का उल्लास है,
रागात्मकता का विलास है,
मन-मयूर नाच उठता है,
गीत बन निखरता है।
‘प्रेम’मन का विश्वास है,
जीवन की मिठास है,
तीखी तकरार है,
मीठी मनुहार है,
रोम-रोम लहलहाता है,
गीत बन जाता है।
शूल कहीं चुभता है,
मर्म चीख उठता है,
मीत याद आता है,
दर्द और भी बढ जाता है,
अन्तस गुनगुनाता है,
गीत बुन जाता है।
बसन्त रितु का प्रसार,
नवयौवना का विरह श्रुंगार,
प्रिय का इन्तज़ार,
विरहणी की अश्रुधार,
दर्द छलक जाता है,
गीत बन-संवर जाता है।
डा. रमा द्विवेदी
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December 2, 2006 at 7:47 am (संवेदना की अनुभूतिय)
१- पत्थर युग में
ऐसा लगता है हम
पत्थर युग की ओर
धीरे-धीरे सरक रहे हैं।
अच्छा है अगर,
अगर सब पत्थर बन जाएं
कम से कम ऊंच-नीच की खाई तो
पट जायेगी
और भावनाएं इस तरह
लहूलुहान तो नहीं होंगी॥
२- उडने की कोशिश
चिडियों की ऊंची और ऊंची
उडने की कोशिश भी
आकाश को छू नहीं पातीं
पर इसका अर्थ
यह कतई नहीं
कि वे उडना छोड दें॥
डा. रमा द्विवेदी
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