सभी महानुभावों को मेरी ओर से नववर्ष की अनन्त शुभकामनाएं
बस ऐसा यह नूतन वर्ष हो,
जन-जन के मन में हर्ष हो।रोटी प्रथम हलधर को मिले,
न भूख से अब कोई मरे,
सब बांट कर खाएं-पिएं,बस,
जीवन का ये ही धर्म हो॥आओ करें संकल्प सब
बंधुआ न अब बचपन रहे,
खेलें-पढें,गाएं-हंसें,
उनके भी मन में हर्ष हो॥स्त्री-भ्रूण हत्या बंद हो,
सांसों से इक अनुबंध हो,
जीने का हक उसको मिले,
जीवन का तब उत्कर्ष हो॥त्योहार का रंग प्रेम हो,
रिश्तों में बस विश्वास हो,
जीवित रहे चिर-मानवता,
जीवन का यह संकल्प हो॥तम-तमस का नाश हो,
बस ग्यान का प्रकाश हो,
ओढे चुनर धानी धरा,
धरती पे उतरा स्वर्ग हो॥बस ऐसा नूतन वर्ष हो,
बस ऐसा नूतन वर्ष हो।डा. रमा द्विवेदी
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ऐसा नूतन वर्ष हो -2007
चांद की सैर का ख्वाब
चांद पर ज़मीन खरीदने लगे हैं लोग,
चांद पर रहने का इन्तज़ाम करने लगे हैं लोग,
इक्कीसवीं सदी में मानव चांद पर-
सैर-सपाटे के लिए जायेगा,
सारे काम यंत्र करेंगे,
मानो मानव यंत्रमय हो जायेगा।
न संगिनी की खटपट,
न रोटी कमाने का चक्कर,
चक्कर लगाते-लगाते वह,
आज की राजनीति का अधिवेशन,
मंगल पर जा करेगा,
चुनावी रणनीति वहीं पर तै करेगा।
वहां पर बैठे-बैठे वह,
सब कुछ हजम कर जायेगा,
और तो और जनता के
आक्रोश से भी बच जायेगा।
कई क्लोनिंग जीव वहां नज़र आयेंगे,
इस विचित्र माइक्रो दुनिया में,
कोई हिटलर, कोई लादेन,
कोई सफेदपोश रावण,
जो वहां से भी सीता का-
हरण कर ले जायेगा ।
सबसे पहले सफेदपोश जीव ही,
वहां आवास बनायेगा,
चक्कर काटने में हैं वे निपुण,
इसलिए चांद की सैर करवाने का,
ख्वाब जनता को दिखायेंगे,
जनता है बावरी ,
ऐसे नेता को ही जितायेंगे ॥डा. रमा द्विवेदी
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कुछ मुक्तक
१- चाहे कितना ही बड़ा हो,
पौरुष तुम्हारा ।
मेरे अस्तित्व के अंक में आ,
शान्त होता है अहं तुम्हारा॥२- अपनी पीड़ा को पीकर भी,
मैं प्यार तुम्हें देती हूं।
अपना सब कुछ खोकर भी,
हर पल छांव तुम्हें देती हूं॥३- सदियों से नारी विलख रही,
चाहे पहना हो कितना ही गहना ?
आत्मा जब उसकी बनी है बंदी,
फिर गहने पहन के क्या करना?४- युग बदला,सब बदल गया,
गहनों की अब चाह रही ना।
दिल का सुकून जरूरी है,
अन्तस की हंसी है अब मेरा गहना॥५- यूं तो कई रिश्ते हैं नारी के साथ,
पर नारी के लिए हैं सब बेकार।
अपने ही उसकी आत्मा का हनन कर रहे,
कैसा है यह संबंधों का साम्राज्य?डा. रमा द्विवेदी
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पौरुष सिमट रहा है
प्रेयसी का आज बादल उम़ड रहा है।
उसके ही आस-पास पौरुष सिमट रहा है॥संकीर्णता विचारों की इस क़दर ब़ढने लगी है।
जाने-पहचाने चेहरों में ही वो सिमटने लगी है॥मोह का कोहरा कुछ इस क़दर छाने लगा है।
इंसान जहां से बौना नज़र आने लगा है॥इक्कीसवीं सदी में मानव कुछ ऐसा क़हर ढ़ाएगा।
चांद तो क्या वो धरती से भी उख़ड जाएगा॥डा. रमा द्विवेदी
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मानवता की कमी
देशों का सरताज़ अमेरिका,
प्रगति का अंबार अमेरिका,
अस्त्रों का भंडार अमेरिका,
प्रक्रति का मणिहार अमेरिका।यहां मानव है पर समाज नहीं,
संबंध हैं पर विश्वास नहीं,
दिलों में प्यार की चाह है,
पर उसमें मिठास नहीं।व्यावहारिकता रिश्तों का आधार है,
औपचारिकता यहां का शिष्ठाचार है,
सरलता,ईमानदारी सबसे बडी नियामत है,
हेलो,गुड्मार्निंग,थैंक्स ही सबसे बडा प्यार है।सब कुछ यहां यंत्रवत है,
प्यार ,व्यापार में अंतर नहीं,
रिश्ते अटूट बंधन में बंधें,
यहां ऐसा कोई तंत्र नहीं।स्वतंत्रता यहां का सबसे बडा उपहार है,
फैशन का यहां कोई न पारावार है,
कच्ची उम्र में”डेटिंग” करते हैं यहांं,
सबसे ज्यादा प्रचलित यह शिष्ठाचार है।काश! यहां पर भी सामाजिकता होती,
तब किसी भी तरह की औपचारिकता न होगी,
सब अपने आप में डूबे हुए हैं यहां,
मानवता की ऐसी कमी कहीं देखी न होगी।(अमेरिका प्रवास (२००१) के समय लिखी गई कविता )
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