‘प्रेम’ दिल की पुकार है,
ह्रिदय का विस्तार है,
स्वप्निल संसार है,
रस की फ़ुहार है,
तन-मन झूम जाता है,
गीत बन जाता है।‘प्रेम’ जिजीविषा का विकास है,
जीवन का प्रकाश है,
अधरों का उल्लास है,
रागात्मकता का विलास है,
मन-मयूर नाच उठता है,
गीत बन निखरता है।‘प्रेम’मन का विश्वास है,
जीवन की मिठास है,
तीखी तकरार है,
मीठी मनुहार है,
रोम-रोम लहलहाता है,
गीत बन जाता है।शूल कहीं चुभता है,
मर्म चीख उठता है,
मीत याद आता है,
दर्द और भी बढ जाता है,
अन्तस गुनगुनाता है,
गीत बुन जाता है।बसन्त रितु का प्रसार,
नवयौवना का विरह श्रुंगार,
प्रिय का इन्तज़ार,
विरहणी की अश्रुधार,
दर्द छलक जाता है,
गीत बन-संवर जाता है।डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved
प्रेम जिजीविषा का विकास है
The URI to TrackBack this entry is: http://ramadwivedi.wordpress.com/2006/12/02/premjijeevishakaavikashai/trackback/
रमा जी:
बहुत अच्छा लगा आप का यह गीत
> प्रेम जिजीविषा का विकास है
> जीवन का प्रकाश है
> अधरों का उल्लास है
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है
अनूप
रमा जी:
बहुत अच्छा लगा आप का यह गीत
> प्रेम जिजीविषा का विकास है
> जीवन का प्रकाश है
> अधरों का उल्लास है
सुन्दर अभिव्यक्ति है
अनूप
अनूप जी,
आपका आशीष प्राप्त हो गया बस मेरी रचनाधर्मिता सार्थक हो गई। मैं आपकी ह्रिदय से आभारी हूं।
प्रेम ही एक ऐसा चिज है जो हमारे जीवन को सुन्दर बनादेता है ।
सचमुच बहुत अच्छी कविता थी
विनय जी,
’अनुभूति कलश’ में आपका आपका हार्दिक स्वागत है। आपको कविता पसन्द आई यह मेरा सौभाग्य है….अन्य रचनाओं पर भी अपने विचार प्रेषित करियेगा ….इसी कामना के साथ…हार्दिक आभार सहित…