अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

मानवता की कमी

         देशों का सरताज़ अमेरिका,
          प्रगति का अंबार अमेरिका,
          अस्त्रों का भंडार अमेरिका,
          प्रक्रति का मणिहार अमेरिका।

          यहां मानव है पर समाज नहीं,
          संबंध हैं पर विश्वास नहीं,
          दिलों में प्यार की चाह है,
          पर उसमें मिठास नहीं।

          व्यावहारिकता रिश्तों का आधार है,
          औपचारिकता यहां का शिष्ठाचार है,
          सरलता,ईमानदारी सबसे बडी नियामत है,
          हेलो,गुड्मार्निंग,थैंक्स ही सबसे बडा प्यार है।

          सब कुछ यहां यंत्रवत है,
          प्यार ,व्यापार में अंतर नहीं,
          रिश्ते अटूट बंधन में बंधें,
          यहां ऐसा कोई तंत्र नहीं।

          स्वतंत्रता यहां का सबसे बडा उपहार है,
          फैशन का यहां कोई न पारावार है,
          कच्ची उम्र में”डेटिंग” करते हैं यहांं,
          सबसे ज्यादा प्रचलित यह शिष्ठाचार है।

          काश! यहां पर भी सामाजिकता होती,
          तब किसी भी तरह की औपचारिकता न होगी,
          सब अपने आप में डूबे हुए हैं यहां,
          मानवता की ऐसी कमी कहीं देखी न होगी।

          (अमेरिका प्रवास (२००१) के समय लिखी गई कविता )
           डा. रमा द्विवेदी

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December 11, 2006 - Posted by ramadwivedi | संवेदना की अनुभूतिय | | No Comments

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