अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

कुछ मुक्तक

१-       चाहे कितना ही बड़ा हो,
           पौरुष तुम्हारा ।
           मेरे अस्तित्व के अंक में आ,
           शान्त होता है अहं तुम्हारा॥

 २-     अपनी पीड़ा को पीकर भी,
           मैं प्यार तुम्हें देती हूं।
           अपना सब कुछ खोकर भी,
           हर पल छांव तुम्हें देती हूं॥

 ३-     सदियों से नारी विलख रही,
          चाहे पहना हो कितना ही गहना ?
          आत्मा जब उसकी बनी है बंदी,
          फिर गहने पहन के क्या करना?

  ४-     युग बदला,सब बदल गया,
            गहनों की अब चाह रही ना।
            दिल का सुकून जरूरी है,
            अन्तस की हंसी है अब मेरा गहना॥

 ५-     यूं तो कई रिश्ते हैं नारी के साथ,
           पर नारी के लिए हैं सब बेकार।
           अपने ही उसकी आत्मा का हनन कर    रहे,
           कैसा है यह संबंधों का साम्राज्य?

              डा. रमा द्विवेदी  

© All Rights Reserved

December 20, 2006 - Posted by ramadwivedi | मुक्तक | | No Comments

No Comments »

No comments yet.

Leave a comment