January 29, 2007 at 3:15 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
देवताओं के स्वर्ग में,
क्या धरती का स्वर्ग है?
न जन्म का बंधन,न म्रित्यु का भय,
न कर्त्तव्यों की कशमोकश,
ना दायित्वों का बोझ,
वहां पर है रोशनी का तेज प्रकाश,
अप्सराओं का सॊन्दर्य-न्रित्य,
सोम-रस पान,ईर्ष्या-द्वेष,पद की चाह,
न्रित्यांगनाओं का न्रित्य कर-
देवताओं को रिझाना-बहलाना,
उनके इशारों पर चल,
तपस्वियों की तपस्या भंग करना,
शापवश धरती पर आना,
मातुत्व प्राप्त करना,
शाप-अवधि पूर्ण होने के उपरान्त,
वापस लौट जाना,
चमक-दमक की दुनिया में,
जहां मातुत्व-स्नेह का ,
नाममात्र नहीं,
इसे पाने के लिए,
देवी-देवताओं को भी,
धरती के स्वर्ग पर ही,
अवतरित होना पड्ता है,
फिर क्यों स्वर्ग-मोक्ष की,
चाह करते हैं लोग?
धरती का स्वर्ग जो सहज ही,
सबको प्राप्त है,
उसका अनुभव नहीं कर पाते,
जो अप्राप्त है,अद्रश्य है,
उसकी आकांक्षा करना,
म्रगतिष्णा के सिवा कुछ नहीं,
जिसे हम देख नहीं सकते,
जिसे जी नहीं सकते,
उसके पीछे दौड़ना नादानी है।
जो प्राप्त है ,उसे महसूस करो,
सच्चे सुख की अनुभूति होगी,
तब तुम स्वयं ही कहोगे कि-
स्वर्ग कहीं और नहीं है,
स्वर्ग यहीं है, स्वर्ग यहीं है॥
डा. रमा द्विवेदी
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January 26, 2007 at 4:31 pm (गीत)
सभी मित्रों को गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएं
भारतीय जवानों के सम्मान में मैंने यह गीत लिखा है….”जय जवान, जय हिन्दुस्तान”
यूं तो प्रहरी से खड़े हैं ये हिमालय हैं बड़े।
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े॥
शब्द गा सकते नहीं तेरे जीवन की कहानी,
देश के हित झोंक दी है,तूने पूरी ज़िन्दगानी,
देश का जन-जन रिणी है,छांव में जो तेरी पले…
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।
तुझसे ही तो यहां की हर कली मुस्कायेगी,
तेरे बिन तो यहां की हर गली सो जायेगी,
तुम नहीं तो हम नहीं,तुम हर दुआओं से बड़े…
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।
जल-थल-नभ में तेरा रुतबा अरु तेरी ही शान है,
तुझसे अपनी आबरू है, अरु तुम्हीं से आन है,
तुम समन्दर अरु धरा,आकाश से भी तुम बड़े…..
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।
यूं तो प्यारा झंडा हमारा झुकता नहीं है यह कभी,
पर तेरे सम्मान में झुक जाता है यह हर कहीं,
करते नमन, शत-शत नमन,हर सांस में तू ही चले…
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े।
डा. रमा द्विवेदी
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January 11, 2007 at 5:16 am (गीत)
तुम बनाओगे महल या बनाओ झोपड़ी,
नींव का आधार है यह जमीं,यह जमीं।
जन्म से मिलती है हमको यह जमीं,यह जमीं,
लोटकर इसकी गोद में हमको जवानी है मिली,
आया बुढ़ापा और फिर मृत्यु में भी साथ यह,
मृत तन को भी देती है आश्रय यह जमीं,यह जमीं।
ज़ुल्म हो, आतंक हो बस यह जमीं ही सहती है,
सदियों के इतिहास को भी यह जमीं ही कहती है,
दर्द से फट जाता है जब कभी इसका कलेजा,
खुद में समा लेती है सबको, यह जमीं,यह जमीं।
इस जमीं के बिना अस्तित्व जीवों का नहीं,
इसके बिना जीवन नहीं,जीवन की कल्पना नहीं,
हर सांस में शामिल है ये,ज़िन्दगी के बाद भी,
मृत -ज़िन्दगी का कफ़न भी है यह जमीं,यह जमीं।
आओ मिल कर कुछ करें इस जमीं के लिए,
तरु-सरोवर को बचाएं,हरित वसुधा के लिए,
स्वर्ग से बेहतर बनाएं रह न जाए कुछ कमीं,
देंगे नई पीढी को हम सुन्दर जमीं सुन्दर जमीं।
डा. रमा द्विवेदी
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January 10, 2007 at 12:38 pm (गीत)
दिल था जिसे तलाशता वो प्यार न मिला,
झंक्रित जो कर दे दिल के तार, दिलदार न मिला।
लहरें चली थीं चांद को लेने आगोश में,
इज़हार करके थक गईं,वस्ल-ए-यार न मिला।
मुक्ति की चाह में जो भटकती हैं तंग गलियों में,
वो रास रचैया उन्हें भी श्याम न मिला।
जल बिन तड़पती मीन सी तड़पी थी राधिका,
वन में तड़पती सीता को भी राम न मिला।
अस्मिता तक लगा दी जुआं के दांव पर,
मेरी आत्मा का फिर भी खरीदार न मिला।
अभिशप्त चकवा-चकई रातों में हैं विलखते
फिर भी अमा की रात,चांद का उजियार न मिला।
डा. रमा द्विवेदी
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