अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

वो प्यार न मिला

        दिल था जिसे तलाशता वो प्यार न मिला,
        झंक्रित जो कर दे दिल के तार, दिलदार न मिला।

        लहरें चली थीं चांद को लेने आगोश में,
        इज़हार करके थक गईं,वस्ल-ए-यार न मिला।

        मुक्ति की चाह में जो भटकती हैं तंग गलियों में,
        वो रास रचैया उन्हें भी श्याम न मिला।

        जल बिन तड़पती मीन सी तड़पी थी राधिका,
        वन में तड़पती सीता को भी  राम न मिला।

         अस्मिता तक लगा दी जुआं के दांव पर,
         मेरी आत्मा का फिर भी खरीदार न मिला।

        अभिशप्त चकवा-चकई रातों में हैं विलखते
        फिर भी अमा की रात,चांद का उजियार न मिला।

         डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

January 10, 2007 - Posted by ramadwivedi | गीत | | 1 Comment

1 Comment »

  1. अर्ज किया है:

    तेरी कायनात में ए खुदा मेरा दिल कहीं लगा नहीं,
    जो तसल्लियाँ मेरे दिल को दे ऐसा कोई मिला नहीं।

    Comment by Shrish | January 11, 2007

Leave a comment