स्वर्ग यहीं है
देवताओं के स्वर्ग में,
क्या धरती का स्वर्ग है?
न जन्म का बंधन,न म्रित्यु का भय,
न कर्त्तव्यों की कशमोकश,
ना दायित्वों का बोझ,
वहां पर है रोशनी का तेज प्रकाश,
अप्सराओं का सॊन्दर्य-न्रित्य,
सोम-रस पान,ईर्ष्या-द्वेष,पद की चाह,
न्रित्यांगनाओं का न्रित्य कर-
देवताओं को रिझाना-बहलाना,
उनके इशारों पर चल,
तपस्वियों की तपस्या भंग करना,
शापवश धरती पर आना,
मातुत्व प्राप्त करना,
शाप-अवधि पूर्ण होने के उपरान्त,
वापस लौट जाना,
चमक-दमक की दुनिया में,
जहां मातुत्व-स्नेह का ,
नाममात्र नहीं,
इसे पाने के लिए,
देवी-देवताओं को भी,
धरती के स्वर्ग पर ही,
अवतरित होना पड्ता है,
फिर क्यों स्वर्ग-मोक्ष की,
चाह करते हैं लोग?
धरती का स्वर्ग जो सहज ही,
सबको प्राप्त है,
उसका अनुभव नहीं कर पाते,
जो अप्राप्त है,अद्रश्य है,
उसकी आकांक्षा करना,
म्रगतिष्णा के सिवा कुछ नहीं,
जिसे हम देख नहीं सकते,
जिसे जी नहीं सकते,
उसके पीछे दौड़ना नादानी है।
जो प्राप्त है ,उसे महसूस करो,
सच्चे सुख की अनुभूति होगी,
तब तुम स्वयं ही कहोगे कि-
स्वर्ग कहीं और नहीं है,
स्वर्ग यहीं है, स्वर्ग यहीं है॥डा. रमा द्विवेदी
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बहुत प्रासंगिक कविता जो ज्ञान देती है…समझ की ओर इशारा करती है…और स्वयं के भीतर स्वर्ग होने बात करती है…अद्भुत…!!
बहुत बहुत शुक्रिया दिव्याभ मेरे ब्लाग पर आने के लिए।आपका ब्लाग बहुत सुन्दर है सुन्दर रचनाओं के साथ।
आपके बारे मे पढा अच्छा लगा.. आपकी ये रचना एक गूढ सत्य को दर्शाती है..काश हर मानव अपने भीतर सत्य को ढूंढ सके..
मान्या जी , बहुत बहुत आभारी हूं कि आपको रचना पसन्द आई।
डा. रमा द्विवेदी