अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

प्यार का इश्तहार नहीं करते

             उसने कहा क्यों प्यार का इज़हार नहीं करते?
              हमने कहा चुप रह के क्या इक़रार नहीं करते?

              तूफ़ां की तरह आके गुजर जाना भी अच्छा नहीं
              हम प्यार की कश्ती को मझधार नहीं करते।

              लेबेल लगा के प्यार को बाज़ार कर दिया,
              यह इश्क है ज़नाब, इश्तहार नहीं करते।

              इज़हार करने वालों की फ़ेहरिस्त बड़ी लंबी है,
              इक़रार करने वाले भी तो सच्चा प्यार नहीं करते।

              ढ़ाई आखर प्रेम को दिल में उतार लो,
              बस ताजमहल देख कर सरताज नहीं बनते।

              इश्क में मिट जाने का ग़र इल्म नहीं आया,
              खुदा से ऐसे लोग कभी प्यार नहीं करते ।

                   डा. रमा द्विवेदी

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February 3, 2007 - Posted by ramadwivedi | गीत | | 12 Comments

12 Comments »

  1. बहुत सुंदर लिखा है रमा जी….बधाई !!

    Comment by रीतेश गुप्ता | February 3, 2007

  2. this is a comment and i think that it will work

    Comment by Sanjeev Kuymar | February 3, 2007

  3. वाह डॉक्टर साहिबा.. बहुत ख़ूब.. आपके चिट्ठे पर पहली बार आया और सौभाग्य से बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली है. धन्यवाद

    Comment by नीरज दीवान | February 3, 2007

  4. सुन्दर कविता रमा जी।

    Comment by Shrish | February 3, 2007

  5. सच कहुँ मैडम, यह पढ़ने के बाद मैं मुस्करा रहा हूँ…बड़े गहराई में जाकर तथ्यों को पकड़ा है…यह जो चंचल मन का वातायन है…चाहता है हमेशा प्रकट आवरण!!!

    Comment by Divyabh | February 3, 2007

  6. रीतेश जी ,शुक्रिया कि आप को रचना पसन्द आई।उम्मीद है आगे भी आप अपनी राय से अवगत कराते रहेंगे।

    संजीव जी, आपकी प्रतिक्रिया तो कुछ नहीं आई लेकिन मैं समझ गई कि आप कुछ कहना चाहते थे…..धन्यवाद सहित…

    नीरज दीवान जी, आपकी पहली नज़र मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, भविष्य में भी आप अपने विचारों से अवगत कराते रहेंगे। आभार सहित….

    श्रीश जी ,आपकी प्रतिक्रिया का मुझे हमेशा इन्तज़ार रहता है।अपनी राय देना कभी न भूलिइएगा,… आभारी हूं…

    दिव्याभ जी, आप मुस्काए तो सही,बस मेरी रचना सार्थक हो गई……रचनाकार तो यही चाहता है कि सुधी पाठक उसकी रचना को समझे और उचित राय दें…रह गई आवरण की बात तो मैं यह कहूंगी कि कभी कभी आवरण में सौन्दर्य होता है…..सब कुछ प्रगट हो गया कि आकर्षण समाप्त हो जाता है ।उम्मीद है मेरी बात आप समझ गए होंगे।आपकी ह्रिदय से आभारी हूं। आपके विचारों का मुझे इन्तज़ार रहेगा।

    डा. रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | February 4, 2007

  7. रमा जी, बहुत सुंदर रचना है।
    “इश्क में मिट जाने का गर इल्म नहीं आया,
    खुदा से ऐसे लोग कभी प्यार नहीं करते।”
    इन पंक्तियों मेंप्यार-दर्शन का निचोड़ रख दिया है।

    Comment by महावीर | February 4, 2007

  8. आदर्णीय शर्मा जी,

    आपको रचना पसन्द आई बस मेरी रचनाधर्मिता को एक नई ऊर्जा प्राप्त हो गई।आपके आशीष का मेरी कलम को हमेशा इन्तज़ार रहेगा। ह्रिदय से आभारी हूं।

    रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | February 5, 2007

  9. रमा जी नमस्कार, पहले भी आपके पेज पर आना हुआ, टिप्पणी इसलिए नहीं दे सका था कि ब्लोग-जगत से अनजान था, नि:संकोच यह कह सकता हुं कि आप अच्छा लिखती हैं, शुभकामनाएं

    Comment by संजीत त्रिपाठी | February 12, 2007

  10. त्रिपाठी जी,

    आपकी बहुत बहुत आभारी हूं कि आपको मेरी रचनाएं पसन्द आई ।भविष्य में भी अपनी राय अवश्य भेजिईयेगा। धन्यवाद सहित…..

    डा. रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | February 15, 2007

  11. fir se mein shabdheen hun. kuch rachnaaye padne ke baad bhut anand milta hai ye yakinan unhi mese ek hai.
    anand prapt hua isliye sahradye danywaad
    hemjyotsana

    Comment by hemjyotsana parashar | August 8, 2007

  12. हेमज्योत्सना जी,

    यह आपकी उदारता है कि आपने मेरी सारी रचनाएं पढ़ी और अपनी भावनाओं से परिचय करवाया…बहुत अच्छा लगा…दिल से आभारी हूं…

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | August 9, 2007

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