अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

कैसे लांघी- मर्यादा?

                    तुम तो मर्यादा में रहते,
                     यही सुना था,यही पढ़ा था।
                      फिर कैसे लांघी मर्यादा?
                     और तांडव न्रित्य किया था॥

                     त्राहि-त्राहि मच गई चहुदिशि,
                     कैसा क्रूर रूप धरा था।
                     कुछ पल में ही नष्ट कर गए,
                     आस-पास निस्तब्ध बना था॥

                      ऐसा दंड फिर कभी न देना,
                     यह स्रिष्टि ना सह पायेगी। 
                      खुद पर इतना पाप न लेना,
                     तुम्हें मुक्ति ना मिल पायेगी॥

                     माना अपराध हुआ है हमसे,
                     पर्यावरण मिटाने का।
                      क्षमादान दे सकते थे तुम,
                     एक बार समझाने का॥

                     तेरी इच्छा तू ही जाने,
                     हम तो तुझको पूज्य मानते।
                     तुम ही तो जीवन-जल देते,
                     जीवन का अभिभाज्य मानते॥

                     स्रिष्टि में तुम, तुम में स्रिष्टि,
                     संभव नहीं कुछ तेरे उपकार बिना।
                      तेरे अति से, तेरे अभाव से,
                     अस्तित्व नहीं जीवन का  यहां॥

                            डा. रमा द्विवेदी

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February 4, 2007 - Posted by ramadwivedi | संवेदना की अनुभूतिय | | 8 Comments

8 Comments »

  1. sachmuch bahut achchhe bhaw hain us param shakti ke prati.. ye sansaar usi par to aashrit hai.. agar wo hi maryada laanghe to fir widhwans hi wdhwans hai,… kaash wo sachmuch hamein kshma kar paaye..

    Comment by manya | February 4, 2007

  2. इस बात को लेकर काफी तर्क हुआ है कि क्या मानव ईश्वर की कठपुतली मात्र है क्योंकि
    उसकी आज्ञा के बिना अगर पत्ता नहीं हिलता तो फिर मानवीय स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाएगा…लेकिन मानव एक अनूठी चीज लेकर जन्मा है वह है विवेक…जो मानव को स्वतंत्र और जिज्ञासु बनाता है…वह तो पिता है जिसका क्षमा करना कर्तव्य है…लेकिन अंकुश भी तो उतना ही आवश्यक है…अगर यह न हो तो मानव खुद ही अपनी कब्र खोद लेगा…सभी
    कुछ को समेटने के चक्कर में…कविता बहुत सुकून देती है…सुंदर्।यह मेरा, विचार पर एक विचार है!!

    Comment by Divyabh | February 4, 2007

  3. बहुत उमदा बातें कहदीं रमाजी आपने

    Comment by SHUAIB | February 5, 2007

  4. शुऐब जी, बहुत शुक्रिया। अपने राय ऐसे ही देते रहिइयेगा।

    रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | February 5, 2007

  5. मान्या जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया । उस परम शक्ति पर आपकी आस्था को नमन करती हूं।

    दिव्याभ जी , आपका कथन सत्य है हम इस विषय पर काफ़ी तर्क कर चुके हैं या करते हैं किन्तु उस अद्रिश्य शक्ति का अस्तित्व इससे कम या ज्यादा नहीं हो जाता। कुछ तो है जहां पर जाकर मानव का सारा ग्यान और तर्क धरा का धरा रह जाता है। प्रक्रति मानव से ज्यादा ताकतवर है। आपके विचार जान कर बहुत अच्छा लगा…..शुक्रिया….. आपके विचारों का मैं स्वागत करती हूं।

    रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | February 5, 2007

  6. वाह वाह, बहुत सुंदर. बधाई लें.

    Comment by समीर लाल | February 5, 2007

  7. शुक्रिया समीर जी।
    रमा द्विवेदी

    Comment by ramadwivedi | February 7, 2007

  8. बहुत सुन्दर रचना है बाकी अभी बहुत कुछ पढने एंव समझने को बाकी है
    मेरे ब्लाग http://dilkadarpan.blogspot.com पर पधार कर अपनी टिप्पणी से मेरी रचनाओं का मुल्याकंन करने की कृपा करें
    विशेष रूप से मेरी एक कविता “केवल संज्ञान है” जो http://merekavimitra.blogspot.com पर प्रेषित है आप की टिप्पणी की प्रतीक्षा में है

    मोहिन्दर

    Comment by Mohinder Kumar | February 15, 2007

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