अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

ग़ज़ल

याद जब आई कभी, आंसू निकल कर बह गए
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते ग़म सह गए।

यूं तो तेरा हर लम्हा, यादों के नग़मे बन गए
वो ही नग़मे साज़े-ग़म पर गाते गाते रह गए।

जब मिले वो, रुक गया जज़्बात का इक कारवां
जाने क्या कुछ कह गए, जज़्बात में हम बह गए।

दो क़दम बस दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गए, नक़्शे-क़दम ही रह गए।

पूछते हैं रास्ते, आंखों में आंसू देख कर,
अब कहां है हम-सफ़र, तुम क्यों अकेले रह गए।

दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था,
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए।

ख्वाब में दीदार हो जाता तिरी तस्वीर का,
नींद भी  आती नहीं, ये भी सहारे रह गए।
महावीर शर्मा
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February 17, 2007 - Posted by ramadwivedi | संवेदना की अनुभूतिय | | 1 Comment

1 Comment »

  1. bhut sundar , mahavirji sir ki rachnaye unke blog per padi thi. hamesha ki ye bhi bhut achi lagi.
    ek chota sa phool meri tarah se bhi swikaar kerne.
    दर्द और अश्को से भरी गज़लो में डूबे जो हम ,
    भीगी पलक से मौन हुऐ, हम सागर की तरह बह गये ।

    Comment by hemjyotsana parashar | August 8, 2007

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