ऊंचाई मनुष्य को अपने परिवेश से,
करती है अलग,
ऊंचाई चाहे पद की हो,
पैसे की हो या ज़ान की,
मनुष्य सहज नहीं हो पाता,
अपने स्तर की चाह में वो,
कहीं सुकून नहीं पाता,
स्तर की समानता है आवश्यक,
समानता जुड़ने का है एक माध्यम,
असमानता में मानव टूट सकता है,
किन्तु वह सहज नहीं हो पाता।
विचारों की असमानता,
संबंधों के टूटने का,
है एक विशेष कारण,
विचारों की असमानता ,
मनुष्य को अनजाने ही,
कठोर बना देती है,
आत्म विस्तार के अभाव में,
अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को ,
दांव पर लगा देती है।
झगड़ा रिश्तों का नहीं,
विचारों का होता है,
विचारों के झगड़े में ही,
मानव रिश्तों को खोता है।
रिश्तों को निभाने का वह ,
असफल प्रयास करता है,
किन्तु अपनी सोच के परिवर्तन का,
कोई उपचार नहीं करता,
हर समस्या का समाधान ,
हर एक के दिल में होता है,
विश्वास,आत्मीयता,सही सोच,
रिश्तों को बनाये रखने का,
अचूक हल होता है।डा. रमा द्विवेदी
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विचारों की असमानता
आसान नहीं
चुप-चुप रहकर आंसू पीना,
आसान न यह ग़म होता है।
मिट-मिट करके जीते जाना,
आसान न यह दम होता है॥बंधुआ बन-बन करके जीना,
आसान न वो मन होता है।
तप-तप कर कुछ बनते जाना,
आसान न यह फ़न होता है॥तन का बंधन, मन का क्रंदन,
यह बोझ न कुछ कम होता है।
कोल्हू के बैल सा चलते जाना,
आसान न यह श्रम होता है॥सच्चाई पर चलते जाना,
आसान न यह पथ होता है।
उम्मीदों पर जीवित रहना,
आसान न यह भ्रम होता है॥डा. रमा द्विवेदी
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बादल और पेड़
अटूट रिश्ता है,
बादल और पेड़ का,
बादल घिर आते जब,
पेड़ झूम-झूम जाते तब।
उड़ा ले जाते उन्हें,
न जाने कहां-कहां?
ठंडे होकर बरसते तब,
हरे-भरे हो उठते पेड़,
गुनगुनाते-लहलहाते,
धरती का श्रिंगार बढ़ाते,
जल और हवा प्राणतत्व हैं जीवन के,
इनके बिना असंभव है ,
जीवन की कल्पना |
डा. रमा द्विवेदी© All Rights Reserved
दर्द का इलाज दर्द
कौन किसके दर्द में कोई रोता है?
आदमी अपना दर्द खुद ही ढ़ोता है॥वे आए हाल पूछने औपचारिकता वश।
बस इसके बाद उनका अता-पता न होता है॥हंसने वाले के साथ सभी हंसते हैं ।
रोने के लिए किसका जिगर बड़ा होता है?न रखो जमाने से हमदर्दी की उम्मीद कोई।
क्योंकि जमाना सदा ही बेदर्द होता है ॥अगर मिटाना हो दर्द तो एक दर्द और ले लो।
हर दर्द का इलाज बस यही होता है ॥पियो दर्द को और पियो जीभर कर ।
इस प्रसव के बाद ही तो सृजन होता है ॥न फैलाओ कभी मदद के लिए हाथ रमा।
खुद की ही शक्ति का संबल बड़ा होता है॥डा. रमा द्विवेदी
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सुरक्षा :जीवन या मौत?
नन्हीं सी पौध रोप दी
सड़क के किनारे,
चारो तरफ लगा दी बाड़,
कहीं कोई हिंसक जानवर,
अपने खूंख्वार दांतों से
मसलकर खा न जाए।बेटियों की सुरक्षा में भी
लगा दी जाती है बाड़
कभी प्यार की तो कभी लोहे की,
ताकि कोई खूंख्वार जानवर,
कुचल-मसल कर खा न जाए-
लेकिन प्यार की बाड़,
बेटियों की प्रगति की राह में,
बाधाएं नहीं बनती,
और कली से फूल बनने तक,
खाद पानी का काम करती हैं,
लेकिन लोहे की बाड़ ,
उस कली को खाद पानी के बिना,
मर जाने के लिए
विवश कर देती है ।डा. रमा द्विवेदी
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