March 24, 2007 at 12:34 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
ऊंचाई मनुष्य को अपने परिवेश से,
करती है अलग,
ऊंचाई चाहे पद की हो,
पैसे की हो या ज़ान की,
मनुष्य सहज नहीं हो पाता,
अपने स्तर की चाह में वो,
कहीं सुकून नहीं पाता,
स्तर की समानता है आवश्यक,
समानता जुड़ने का है एक माध्यम,
असमानता में मानव टूट सकता है,
किन्तु वह सहज नहीं हो पाता।
विचारों की असमानता,
संबंधों के टूटने का,
है एक विशेष कारण,
विचारों की असमानता ,
मनुष्य को अनजाने ही,
कठोर बना देती है,
आत्म विस्तार के अभाव में,
अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को ,
दांव पर लगा देती है।
झगड़ा रिश्तों का नहीं,
विचारों का होता है,
विचारों के झगड़े में ही,
मानव रिश्तों को खोता है।
रिश्तों को निभाने का वह ,
असफल प्रयास करता है,
किन्तु अपनी सोच के परिवर्तन का,
कोई उपचार नहीं करता,
हर समस्या का समाधान ,
हर एक के दिल में होता है,
विश्वास,आत्मीयता,सही सोच,
रिश्तों को बनाये रखने का,
अचूक हल होता है।
डा. रमा द्विवेदी
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March 15, 2007 at 4:25 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
चुप-चुप रहकर आंसू पीना,
आसान न यह ग़म होता है।
मिट-मिट करके जीते जाना,
आसान न यह दम होता है॥
बंधुआ बन-बन करके जीना,
आसान न वो मन होता है।
तप-तप कर कुछ बनते जाना,
आसान न यह फ़न होता है॥
तन का बंधन, मन का क्रंदन,
यह बोझ न कुछ कम होता है।
कोल्हू के बैल सा चलते जाना,
आसान न यह श्रम होता है॥
सच्चाई पर चलते जाना,
आसान न यह पथ होता है।
उम्मीदों पर जीवित रहना,
आसान न यह भ्रम होता है॥
डा. रमा द्विवेदी
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March 9, 2007 at 5:38 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
अटूट रिश्ता है,
बादल और पेड़ का,
बादल घिर आते जब,
पेड़ झूम-झूम जाते तब।
उड़ा ले जाते उन्हें,
न जाने कहां-कहां?
ठंडे होकर बरसते तब,
हरे-भरे हो उठते पेड़,
गुनगुनाते-लहलहाते,
धरती का श्रिंगार बढ़ाते,
जल और हवा प्राणतत्व हैं जीवन के,
इनके बिना असंभव है ,
जीवन की कल्पना |
डा. रमा द्विवेदी
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March 9, 2007 at 4:53 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
कौन किसके दर्द में कोई रोता है?
आदमी अपना दर्द खुद ही ढ़ोता है॥
वे आए हाल पूछने औपचारिकता वश।
बस इसके बाद उनका अता-पता न होता है॥
हंसने वाले के साथ सभी हंसते हैं ।
रोने के लिए किसका जिगर बड़ा होता है?
न रखो जमाने से हमदर्दी की उम्मीद कोई।
क्योंकि जमाना सदा ही बेदर्द होता है ॥
अगर मिटाना हो दर्द तो एक दर्द और ले लो।
हर दर्द का इलाज बस यही होता है ॥
पियो दर्द को और पियो जीभर कर ।
इस प्रसव के बाद ही तो सृजन होता है ॥
न फैलाओ कभी मदद के लिए हाथ रमा।
खुद की ही शक्ति का संबल बड़ा होता है॥
डा. रमा द्विवेदी
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March 9, 2007 at 4:38 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
नन्हीं सी पौध रोप दी
सड़क के किनारे,
चारो तरफ लगा दी बाड़,
कहीं कोई हिंसक जानवर,
अपने खूंख्वार दांतों से
मसलकर खा न जाए।
बेटियों की सुरक्षा में भी
लगा दी जाती है बाड़
कभी प्यार की तो कभी लोहे की,
ताकि कोई खूंख्वार जानवर,
कुचल-मसल कर खा न जाए-
लेकिन प्यार की बाड़,
बेटियों की प्रगति की राह में,
बाधाएं नहीं बनती,
और कली से फूल बनने तक,
खाद पानी का काम करती हैं,
लेकिन लोहे की बाड़ ,
उस कली को खाद पानी के बिना,
मर जाने के लिए
विवश कर देती है ।
डा. रमा द्विवेदी
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March 9, 2007 at 4:28 pm (संवेदना की अनुभूतिय)
दहलीज चित्र -१
बेटियों के लिए
एक दहलीज से,
दूसरे दहलीज तक का,
फासला तै करने में,
सदियां बीत जाती हैं,
उस दहलीज को अपना बनाने में
और सच तो यह है कि,
ज़िन्दगी बेमानी सी लगती है
क्योंकि कभी-कभी-
हम उस दहलीज के बन भी नहीं पाते??
दहलीज चित्र -२
दहलीज एक गतिरोध भर नहीं,
यह पहचान है /उस घर की सीमाओं की,
मर्यादाओं की /संस्कारों की,
सुरक्षा की /आत्मीयता की,
यह वरदान भी है,गुमान भी है,
और कभी -कभी अभिशाप भी??
दहलीज चित्र-३
आधुनिक घरों में ,
नहीं रही दहलीज की परम्परा,
इसलिए न कोई मर्यादाएं हैं ,
न जीवन आचरण के मूल्य,
और नई पीढ़ी दिग्भ्रमित हो,
भटक रही है,
मूल्यहीनता की दिशा में॥
दहलीज चित्र-४
अच्छी थी दहलीज की परम्परा,
मर्यादा में बंधी बनिताएं,
सुरक्षित तो थीं।
जब-जब दहलीज का उलंघन हुआ,
परिणाम भयंकर हुए,
काश! सीता ने,
‘लक्ष्मण रेखा’ रूपी दहलीज को,
न लांघा होता तो?
राम-रावण युद्ध न होता,
और स्वयं सीता को,
अग्नि-परीक्षा न देनी पड़ती,
और अपने ही प्रिय से,
उन्हें वनवास भी न मिलता॥
डा. रमा द्विवेदी
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March 3, 2007 at 5:01 pm (गीत)
आई है रंगों की बहार,
गोरी होली खेलन चली।
ललिता भी खेले,विशाखा भी खेले,
संग में खेले नंदलाल ….गोरी होली।
लाल-गुलाल वे मल-मल लगावै,
धोवत होवैं लाल-लाल….गोरी होली।
रूठी राधिका को श्याम मनावे,
प्रेम में हुए हैं निहाल…गोरी होली।
सब रंगों में प्रेम रंग सांचा,
लागत,जियरा मारै उछाल…गोरी होली।
होली खेलत वे ऐसे मगन भईं,
मनुंआ में रहा न मलाल…गोरी होली.।
तन भी भीग गयो,मन भी भीग गयो,
भीगा है सोलह श्रिंगार…गोरी होली।
इसको सतावैं ,उसको मनावैं,
कान्हा की देखो यह चाल…..गोरी होली।
कैसे बताऊं मैं कैसे छुपाऊं,
रंगों ने किया है जो हाल….गोरी होली।
आओ मिल के प्रेम बरसाएं,
अंबर तक उड़े गुलाल…गोरी होली।
सभी मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं
डा. रमा द्विवेदी
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