घर सिर छिपाने के लिए भी होते हैं
घर रिश्ते बनाने के लिए भी होते हैं।
घर क्या-क्या नहीं होता?
घर ज़िन्दगी जलानें के लिए भी होते हैं।घर में ही जन्नत भी होती है,
घर से ही जीवन में रंगत भी होती है।
घर में ही ज़िन्दगी सिसकती हैं यहां,
घर में ही ज़िन्दगी दफ़न भी होती है॥घर ही नहीं बिकते यहां,
इनमें रहने वाले भी बिक जाते हैं।
रोज होता है सौदा ज़िन्दगी का यहां,
घर में रहने वाले हैवान भी बन जाते हैं॥घर ज़िन्दगी क रक्षक भी है,
घर ज़िन्दगी का भक्षक भी है।
घर क्या-क्या नहीं निगल जाता,
घर ज़िन्दगी का तक्षक भी है॥डा. रमा द्विवेदी
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घर क्या-क्या नहीं होता?
चमचे का कमाल (एक हास्य-व्यंग्य कविता)
आजकल हर जगह चमचे आ गये हैं,
प्रशंसा पाने के सस्ते ढंग लोगों को भा गये हैं।
इसलिए आज से चमचे खरीदने का काम करो,
फिर चाहे जो कहो,वाहवाही पाने का नाम करो॥
आजकल चमचों का धंधा बड़े जोरों पर चल रहा है,
जहां देखो, जिसे देखो वही चमचा बन रहा है।
यहां छोटे-बड़े,फोर्क,मस्का लगाने वाले चमचे बिकते हैं,
आपको क्या चाहिए , यह आप सोच सकते हैं?
चमचों से चाहे जो , जैसा भी काम करवाईए,
सभाओं में चमचों से तालियां पिटवाइए ।
और क्या-क्या कहें ज़नाब नई-नई चालें फ़्री पाइए?
हर्रा लगे न फिटकरी , फिर भी रंग चोखा पाइए॥
यही तो प्रजातन्त्र का कमाल है ,
जिसके पास चमचे हैं वही खुशहाल है।
काम करें चमचे और आप करें कैश,
दुनिया जाए भाड़ में ,आप घर बैठे करें ऐश ॥
कभी खुद चमचे बनते हैं,या किसी को बनाते हैं,
येन-केन-प्रकारेण अपना नाम कमाते हैं।
अगर कोई मुसीबत आ भी जाए तो,
चमचों पर ड़ाल खुद बरी हो जाते हैं॥
चमचों की जरूरत क्या नेता को ही होती है ?
या चमचों की जरूरत सृजेता को भी होती है।
संकल्प-शक्ति वाले इसके मोहताज़ नहीं होते,
दूसरों के बल पर कभी सरताज़ नहीं होते ?
प्रधान-मंत्री से मंत्री तक सब चमचे पाल रहे हैं ,
यहां तक कि सृजेता भी इससे अछूते नहीं रहे हैं ।
सबको काम कम , नाम ज्यादा चाहिए,
इसलिए हम सबको चमचे पालने चाहिए ॥
डा. रमा द्विवेदी
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मुझको हरित बनाओ अब…
यह धरती अकुला रही , हमें तुम्हें बुला रही,
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।लगाओ पेड़-पौधे तुम , प्रदूषण को भगाओ तुम,
पाओगे ताजी हवा , रोगों से मुक्ति पाओ तुम,
चेहरा रहे खिला-खिला यही हमें बता रही…
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।जिसने दिया तुम्हें जन्म है उसको न यूं सताओ तुम,
जन्मने का हक़ उसे भी दो यूं भ्रूण न मिटाओ तुम,
सिष्टि चलेगी उससे ही ,बस बात यह बता रही…
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।मुझ पर बनाते घर-मकां , मुझ पर बनाते हो महल,
मुझ पर उगाते अन्न-फल, मुझे रौंदते हो हर पहर,
मुझमें मिलोगे अन्त में , बस बात यह समझा रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।सदियों से रुदन कर रही , न सिसकियां तुमने सुनी ,
जर्जर हुई हर सांस है , टूटेगी जाने किस घड़ी ,
चेतावनी यह समझो प्रलय की घड़ी आ रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।इतना सताओ न मुझे दुनिया में क़हर ढ़ाऊं मैं,
अपनी नहीं चिन्ता मुझे कैसे तुम्हें बचाऊं मैं ,
इंसान ही के वास्ते , मैं खुद को थी मिटा रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।मुझ पर बढ़ा जो भार है ,उसको जरा घटाओ तुम ,
आतंक को तुम रोक दो , यूं रक्त न बहाओ तुम ,
खुशहाल हों सबही यहां , मैं मन्नतें मना रही…
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।डा. रमा द्विवेदी
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सभ्यता बंदी है
कहने को इक्कीसवीं सदी,पर
बर्बरता का नंगा नाच यहां।
सभ्यता यहां पर बनी है बंदी,
अब तक भी नारी का उपहास यहां॥नारी की यातनाओं का,कभी न -
खत्म होने वाला सिलसिला।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे जब,
तब फिर किससे करें गिला॥एक है देवी, दूसरा दानव,
कैसे हो सकता है मेल भला?
देवी-असुर संग्राम चल रहा,
किसकी होगी जीत यहां ॥महाभारत तो कुछ दिन चला था,
सदियों का संग्राम है यह।
दुष्टों के उत्पातों का,
दुष्परिणाम भुगतता समाज है यह॥डा. रमा द्विवेदी
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एक और परीक्षा
तुम जा रहे हो
दूर,घर से बहुत दूर
एक लंबे समय की विदेश यात्रा पर
अकेले रहने की एक और हिम्मत
जुटानी पड़ेगी मुझको
जीवन की एक और परीक्षा
खुद को आजमाने की
देनी पड़ेगी मुझको
अन्तहीन तन्हाईयों का दौर
घेर लेगा मुझे
फिर भी मैं यह सब सहूंगी
सिर्फ तुम्हारे लिए
तुम्हारे लौट आने का
इन्तज़ार करूंगी
यह सब मैं सह लूंगी
क्योंकि तुम्हारे लौटने का इन्तज़ार
मुझे टूटने-बिखरने नहीं देगा ।
डा. रमा द्विवेदी
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