मुक्तक
April 3, 2007 at 4:49 am (संवेदना की अनुभूतिय)
1- मेघ के जलधार बिन,
धरती भी ऊसर बन गई।
प्रेम के रसधार बिन,
मानव को छ्लना छल गई।2- मानव हृदय छलनी हुआ,
अरू रक्त में भी है कमी।
कैसे जियेगा ज़िन्दगी?
बौना हुआ जब आदमी।डा. रमा द्विवेदी
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