मुक्तक

1-  मेघ के जलधार बिन,
     धरती भी ऊसर बन गई।
     प्रेम के रसधार बिन,
     मानव को छ्लना छल गई।

 2- मानव हृदय छलनी हुआ,
     अरू रक्त में भी है कमी।
     कैसे जियेगा ज़िन्दगी?
     बौना हुआ जब आदमी।

           डा. रमा द्विवेदी

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