संवेदनाओं के पुल
कहानीकार: डा. रमा द्विवेदी
“प्रेम” शब्द अपनेआप में कितना व्यापक अर्थ रखता है,कितनी गहराई तक इसकी जड़े समाहित होती हैं? कितनी ऊर्जा प्रदान करता है? संघर्षों से जूझने की कितनी शक्ति देता है? मनुष्य के चरित्र को कितना ऊंचा उठाता है यह “प्रेम”।यह तो वही बता सकता है जिसने कभी सच्चा प्रेम किया हो ।अक्सर रिश्तों में अधिकार की भावना इस प्रेम को बोझिल बना देती है, क्योंकि प्रेम शर्तों पर नहीं किया जा सकता ।’प्रेम’स्वत: अनायास ही उगता है,पल्लवित पुष्पित होता है,और अपना साम्राज्य स्थापित कर लेता है लेकिन यह सब कुछ होता है संवेदनाओं की नींव पर। अगर प्रेमासिक्त संवेदनाएं दो दिलों में न उगें तो संवेदनाओं के पुल का निर्माण कभी नहीं हो सकता} ‘प्रेम’ में सिर्फ़ देने की भावना ही होती है पाने की चिन्ता तो वे नहीं करते जो किसी से सच्चे दिल से प्रेम करते हैं।
प्रेम-पूर्ण द्रिष्टिमनुष्य को आकाश की ऊंचाईयों तक पहुंचा सकती है। प्रेमाश्रु से नख-सिख तक सराबोर कर सकती है। इसी प्रेम द्रिष्टि ने लैला-मजनूं,हीर-रांझा,
शीरी-फ़रियाद, सोहनी-महिवाल व रोमियो-जूलियट को महान बना दिया । यही द्रिष्टि पत्थर में भी प्राण फूंक देती है।हीरा को तराश कर सचमुच हीरा बना कर बेशकीमती बना देती है। इसी प्रेम द्रिष्टि ने मीरा को दीवानी मीरा और राधा को क्रिष्ण की आह्लादिनी शक्ति बनाकर अमरत्व प्रदान किया।न जाने कितने सूर्यों की ऊष्मा और न जाने कितने च्न्द्रमाओं की शीतलता रखती है यह द्रिष्टि। सागर की गहराई भी इसके सामने छोटी जान पड़ती है । यह द्रिष्टि पाने वाला व्यक्ति सात समन्दर पार बैठे व्यक्ति को भी अपने दिल के करीब महसूस करता है या यूं कहें कि प्रेम द्रिष्टि वह दूरबीन है जो अपने प्रिय को अपने अन्दर ही देखती है।
ऐसी ही प्रेम द्रिष्टि पाई थी मानसी और विराट ने। उनका विवाह माता-पिता की इच्छानुसार बिना लेन-देन के बड़ी ही सादगी से संपन्न हुआ था। लाड़ली मानसी की विदाई उसके माता-पिता ने बड़े ही भारी मन से की थी । लड़की के माता-पिता को कुछ तो दु:ख या चिन्ता तो होती ही है कि नए घर,नए लोग व नए माहौल में उनकी बेटी सहज महसूस करेगी या नहीं। फिर भी दिल पर पत्थर रखकर बेटी को दूसरे घर विदा करना ही पड़ता है।
विराट की पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी। वह पी.एच.डी. करने के लिए विदेश जाना चाहता था इसलिए उसके माता-पिता ने जल्दी ही उसकी शादी सुन्दर सुशील एवं पढ़ी लिखी मानसी से करवा दी। विराट बहुत ही कुशाग्र बुद्धी के मेधावी छात्र के साथ-साथ सह्रदय इंसान भी थे।उसने पहले दिन से ही मानसी का ख्याल रखा ताकि उसके घर में उसे कोई तकलीफ न हो फिर भी घरवालों का व्यवहार कुछ न कुछ गड़बड़ा ही जाता। विराट को यह सब अच्छा तो न लगता फिर भी वो उन्हें कुछ भी न कहता किन्तु मानसी के समक्ष माफ़ी मांग लेता। मानसी के लिए तो विराट का प्रेम ही उसका संबल था,इसी तरह दो माह बीत गए।
एक दिन एक पत्र प्राप्त हुआ, विराट ने उसे पढ़ा और खुशी से उछल पड़ा ।उसे ‘प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी’ में पी. एच. डी. के लिए एडमीशन मिल गया था और उसे जल्दी ही वहां जाना था।”विराट की इस खुशी में मानसी भी शामिल थी,किन्तु दिल के किसी कोने में एक चिन्ता थी कि वह विराट से अलग होकर इतने लंबे समय तक कैसे रहेगी? एक अन्जान भय भी था कि अगर विराट वापस नहीं आए तो?”पहले तो मानसी ने विराट को जाने की स्वीक्रिति नहीं दी किन्तु जब विराट ने आश्वस्त किया कि पढ़ाई पूरी होते ही वह शीघ्र वापस आ जायेगा या संभव हुआ तो उसे ही अपने पास बुला लेगा। मानसी के मन में कई दिन तक उथल-पुथल होती रही यह सोचकर कि जो विदेश जाता है,वापस ही नहीं आता लेकिन उसने अपने मन को यह कहकर समझा लिया कि जो होगा देखा जायेगा। उसे विराट की बातों पर विश्वास था इसलिए अग्यात भय से कंपित होते हुए भी उसने विराट को जाने की स्वीक्रिति दे दी। वह उसके उज्जवल भविष्य में बाधक नहीं बनना चाहती थी किन्तु उसने विराट से यह आश्वासन अवश्य ले लिया कि वो निरन्तर पत्र लिखेगा या फोन करेगा। विराट ने उसकी यह मांग सहर्ष मान ली क्यों नहीं मानता? वह भी तो मानसी से दूर नहीं रहना चाहता था।
विराट के जाने की तैयारियां शुरू हुईं। समय के जैसे पंख लग गए हों। शीघ्र ही वो दिन भी आ गया जब विराट सबको छोड़ कर दूर जा रहा था। परिवार के सभी लोगों के साथ मानसी भी उसे विदाई देने एयरपोर्ट गई। सामान की चेकिंग के बाद विराट एक बार फिर अंतिम विदा लेने के लिए आया। रेलिंग के उस पार से उसने अपने लोगों से थोडी बातें की सबसे हाथ मिलाकर अंतिम विदाई ली किन्तु उसने मानसी को बड़ी ही दयनीय प्रेमपूर्ण द्रिष्टि से देखा,शब्द मौन हो गए थे। क्या था उस प्रेमद्रिष्टि में-प्रेम-आश्वासन-या बिछुडने का दु:ख।
कभी-कभी यह द्रिष्टि भी कितनी गहरी-प्रखर-मुखर हो जाती है कि बिना कुछ कहे ही क्या-क्या नहीं कह देती?जो भी था विराट की वह द्रिष्टि मानसी के ह्रिदय में सीधे उतर गई। एक बार तो उसे लगा कि उसका कलेजा ही बाहर आ जायेगा और वो फूट-फूट्कर रो पडेगी किन्तु उसने मुश्किल से अपने को संयत कर लिया। बस वो एक द्रिष्टि को दिल में बसाए घर वापस आ गई। विराट का प्रेम ही अब उसके जीवन को चलाने का आधार बन गया।
कुछ हफ्तों के बाद विराट का पत्र आया कि अब वह व्यवस्थित हो गया है। अन्य तमाम बातों के साथ लिखा था कि वह अपना विशेष ख्याल रखे। अगर मन न लगे तो अपने माता-पिता के घर चली जाए, वो अपने माता-पिता से कह देगा। वे उसे भेजने से मना नहीं करेंगे।इस तरह महीने साल बीत गए। मानसी कभी अपने माता-पिता के घर और कभी विराट के घर आती जाती रही किन्तु विराट की कमी हमेशा खलती रही लेकिन विराट के स्नेहपूर्ण पत्रों के सहारे सदैव ही उसे अपने पास महसूस करती। अक्सर अपने मन को यह कह कर समझा लेती कि पढ़ाई पूरी होते ही शीघ्र ही वापस आ जायेगा।
अकस्मात मानसी कुछ ऐसी बिमार पड़ी कि बहुत इलाज करवाने के बाद भी उसकी सेहत में सुधार नहीं हो रहा था वह दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी। डाक्टरों को समझ में नहीं आ रहा था कि उसका ‘ब्लडप्रेशर लो’ क्यों रहता है?घर के लोग भी चिन्तित रहते कि हम विराट को सूचित कर देते हैं किन्तु मानसी उन्हें बताने न देती यह कहकर कि पढ़ाई छोड़कर आ जायेंगे। कुछ ही महीनों की तो बात है। मानसी का स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा था। स्थिति गंभीरता को भांपकर विराट की मां ने विराट को यह सूचना दी कि मानसी की तबियत काफी नाजुक है। विराट को जैसे ही यह खबर मिली वो उस रात सो नहीं सका। तमाम कुशंकाओं ने उसके मन को बेचैन कर दिया। अब उसकी एक ही चिन्ता थी कि वह शीघ्र ही मानसी के पास पहुंच जाए। सुबह होते ही बड़ी मुश्किल से टिकट का बंदोबस्त किया और शीघ्र ही हवाई जहाज में बैठ गया किन्तु सफ़र था कि काटे नहीं कट रहा था। कुछ घंटे वर्षों के समान प्रतीत हो रहे थे । तरह -तरह के बुरे ख्याल उसके मन -मस्तिष्क को उद्वेलित करते रहे जैसे -तैसे प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुईं और विराट मानसी के पास पहुंच गया।
मानसी बहुत कमजोर हो गई थी इसलिए बिस्तर से उठ भी नहीं सकती थी। विराट ने उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर चूम लिया और बोला-”तुमने यह क्या हालत बना ली है अपनी? ऐसा कौन सा ग़म है जो तुम्हें अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है? अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा । तुम जल्दी से ठीक हो जाओ”। मानसी बहुत खुश थी कि विराट उसके पास था किन्तु दु:ख इस बात का था कि वो अपनी पढ़ाई पूरी किए बिना ही उसके कारण वापस आ गया। मानसी ने विराट को बहुत समझाया कि वह उसकी चिन्ता न करे। वह ठीक है,शीघ्र वापस चला जाए और अपनी पढ़ाई पूरी करे। विराट ने कहा-”नहीं मैं अब तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा”। दोनों में बहुत बहस हुई इस बात पर,” मानसी ने कहा कि यह संभव नहीं है। अभी तुम्हारी नौकरी भी नहीं है, कैसे तुम मेरा खर्च उठाओगे”?लेकिन विराट ने उसकी एक न सुनी और विराट ने ही अपने माता-पिता से कहा कि वो मानसी को साथ ले जाना चाहता है। पहले तो उन्हें इस बात पर असमंजस हुआ किन्तु जब विराट ने हठ की तो माता-पिता मान गए।आखिर बेटे की खुशी में ही उनकी खुशी थी। काफी भागदौड़ व कागजी कार्यवाही के पश्चात मानसी को साथ ले जाने का “वीज़ा” मिल गया। विराट मानसी को लेकर वापस चला गया।
मानसी को माता-पिता व सास-ससुर को छोड़ने क दु:ख तो अवश्य था किन्तु विराट के साथ रहने की खुशी ने इस ग़म को भुलाने में मदद की । वहां पहुंच कर विराट ने मानसी का इलाज करवाया । कुछ तो दवाईयों का असर था और अधिक विराट के प्यार एवं निकटता से मानसी के स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक सुधार होने लगा और शीघ्र ही मानसी ठीक हो गई लेकिन विराट को इस बीच काफी श्रम करना पड़ा अधिक धनार्जन करने के लिए । विराट अधिक से अधिक समय काम करता जिससे उसकी पढ़ाई पूरी होने में विलंब हो गया । जब मानसी को यह पाता चला कि विराट आर्थिक संकट से जूझ रहा है तब उसने एक परिचित की सहायता से नौकरी ढूंढ़ ली और एक स्टोर में नौकरी करने लगी । नौकरी छोटी ही थी किन्तु विराट के लिए यह बहुत मददगार साबित हुई उनके जीवन की जरूरतें पूरी होने लगी।”अहसास बताने की नहीं अनुभूति की वस्तु होती है। अनुभूति स्वयं सब कह देती है। दिखावा-छ्लावा में दो रिश्तों के बीच सेतु बन नहीं सकते और झूठ कभी टिकाऊ नहीं होता। कुछ लोग स्वाभाव के गंभीर होते हैं वे अपना स्नेह ठीक से दिखा नहीं पाते। बेमौसम के बदरा से बरसते नहीं । गंभीर और परिपक्व प्यार ही टिकाऊ होता है और जीवनरूपी गाडी को संतुलित रखने के लिए एवं चलाने के लिए ऐसे ही आत्मीय-विश्वसनीय क्षणों की ही आवश्यकता होती है,जो तपती धूप में एक दूसरे के लिए शीतल छांव बन जाए । ह्रिदय से ह्रिदय का जोड़ इससे ही मजबूत बनता है।” मानसी ने विराट को प्रोत्साहित किया कि वो अपनी पढ़ाई शीघ्र ही पूरी करे तब तक वो काम करेगी । विराट ने अपना अधिक से अधिक समय पढ़ाई में लगाया और कुछ ही महीनों में उसको पी.एच.डी. की डिगरी भी मिल गई । दोनों उस दिन बहुत खुश हुए । प्रयास करने पर एक अच्छी साफ्टवेयर कम्पनी में नौकरी भी मिल गई तब विराट ने मानसी का काम करना बन्द करवा दिया । जीवन खुशी-खुशी बीतने लगा । ऐसे ही कई वर्ष बीत गए। इस बीच वे मैत्रेयी और अंश दो बच्चों के माता-पिता भी बन गए। मानसी बच्चों के पालन-पोषण,पढ़ाई-लिखाई में उलझी रहती और विराट आफिस के काम में व्यस्त रहता। सब कुछ ठीक ही चल रहा था।
मुसीबत बता कर नहीं आती । अचानक नई सरकार बनने से अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई और हजारों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यह गाज विराट पर भी गिरी । ज्यादातर लोग अपने-अपने वतन को लौट गए किन्तु विराट और मानसी वहीं बने रहे।
कुछ महीनों तक तो बचत से काम चला लेकिन शीघ्र ही उन्हें लगने लगा कि अगर काम नहीं मिला तो आगे जीवन निर्वाह करना मुश्किल हो जायेगा । तब दोनों ने नौकरी के लिए हाथ -पांव मारना शुरू किया । उन्हें जो भी छोटी बड़ी नौकरी मिली दोनों करने लगे जीवन सुविधापूर्ण तो नहीं लेकिन किसी तरह चलने लगा । कुछ ही वर्षों में जब आर्थिक व्यवस्था में सुधार हुआ विराट को फिर अच्छी नौकरी मिली किन्तु कड़ी मेहनत करके ही दोनों आगे बढ़ सके एवं बच्चों को पढ़ा-लिखा कर स्वावलंबी बना सके।
इस तरह जीवन के तीन दशक कब बीत गये उन्हें पता ही नहीं चला?”आज जब दोनों सोचते हैं तब लगता है कि अगर एक दूसरे का साथ न होता तो इस परदेश में वे किसके सहारे जीवन गुजारते? उनके जीवन में कई ऐसे झंझावात आए जो उनके जीवन को बुरी तरह झकझोर देते थे लेकिन ये संवेदनाओं के ऐसे पुल थे जो हिल तो जाते थे लेकिन कभी ढ़ह नहीं सके। उनके बीच जो प्रेम-आत्मीयता-विश्वास की ऊष्मा व ऊर्जा थी वो आज भी वैसी ही तरो-ताजा है उसमें कहीं भी लेशमात्र भी बदलाव नहीं आया ।”
“काश !आज की नई पीढ़ी के पति-पत्नी में भी ऐसी संवेदनशील सोच-समझ व आत्मीयता होती जो जीवन की कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने की शक्ति दे सकती और छोटी-छोटी बातों को लेकर स्थिति तलाक तक तो न पहुंचती।”
*************डा. रमा द्विवेदी
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दाम्पत्य प्रेम की अच्छी और प्रेरक कहानी .
बहुत बढ़िया कहानी. आपको नारद पर देख कर अच्छा लगा.
प्रियंकर जी व समीर जी,
बहुत बहुत आभारी हूं कि आपको कहानी पसन्द आई….सादर….
रमा द्विवेदी
अच्छी रचना है। प्राञ्जल और सशक्त शब्द-चयन सौम्य प्रभाव डालते हैं। सच्चे प्रेम की परिभाषा में कुछ स्पष्ट व्याख्या करती तों चार चाँद लग जाते।
हरीराम जी,
बहुत बहुत आभार, सच्चे प्रेम के बारे में इतना कुछ लिखा है….अब आप भी तो कुछ सोचिये….इससे ज्यादा कहानी में बताना संभव नहीं था…..
डा. रमा द्विवेदी
AAP KI KAHANI MAY SIRF PREAM KI AABHIVAKTI HAI
JINDGI MAY JIVAAN SATHI SAY MILNAAE VALAY GUM KABHI KABHI AADMI KO TOOD DATAE HAI
SUPIORIORTY KA COMPLEX AAJ KAL KAY PARIVAR KO THAS NAHAS KAR DETTA HAI
SORRY MAY YAE KYA BATT LAY KAR BAITH GAYA
THIS IS A NICE STORY ,FULLOF FAMILY BONDS
AAPKE SAB PASHNO KA JAWAAB SIRF PREM ME HI HAI …..JAB PREM HOTA HAI JEEVAN KE HAR GUM AUR KHUSHEE HAM SAATH SAATH JEE LETE HAIN…..LEKIN YAH PREM HEE TO DURLABH HAI….. ISLIYE TO SUPIORIORTY COMPLEX SAB KUCH BARBAAD KAR DETA HAI….ATI AHAM HAR MUSEEBAT KEE JAD HAI……SABKO ISASE BACHNA CHAHAIYE…. APANEE RAAI PRESHIT KARNE KE LIYE SHUKRIYAA
बड़ी मार्मिक कहानी है। शैली इतनी प्रभावशाली है जैसे सब कुछ आंखों के समक्ष
चलचित्र की तरह दिखाई दे रहा हो। प्रेम में सच्चाई हो तो इन्सान क्या नहीं कर सकता?
सच्चे प्रेम पर आधारित विराट और मानसी के आदर्श जीवन का थोड़ा सा अंश भी नई
पीढ़ी के पति-पत्नी अपना लें तो प्रेम का अहसास उनके आगामी जीवन के मार्ग-दर्शन देता रहेगा।
थोड़े ही शब्दों में अमेरिका की सामयिक आर्थिक व्यवस्था, वहां के जीवन की झांकी,
प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी आदि का उल्लेख करने से कहानी में बहुत ही सजीवता आगई।
एक सुंदर कहानी के लिए धन्यवाद!
आदरणीय शर्मा जी,
आपका आशीर्वाद इस कहानी को प्राप्त हो गया मेरी लेखनी धन्य हो गई….स्नेह के लिए हार्दिक आभार सहित….