अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

बेशुमार तन्हाईयां

                 ये बेशुमार तन्हाईयां,

                 शायद मेरे ह्रिदय व मस्तिष्क की,

                 बंद खिड़कियां खोल दें,

                 और मैं  कुछ ऐसा कर जाऊं,

                 लिख जाऊं कुछ अमर पंक्तियां,

                 जो संयोग के क्षणों में,

                 मैं न लिख पाई।

                तुम्हारा विरह भी मुझे,

                देता है असीम शक्ति,

                पीड़ा के ऐसे ही क्षणों में तो

                मैनें  कई-कई  सृजन किए हैं।

                         डा. रमा द्विवेदी   

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April 14, 2007 - Posted by ramadwivedi | सृजन के प्रिय क्षण | | 5 Comments

5 Comments »

  1. Sunder likha hae

    Sirjan ke liye tanhaayee badi aawashyak hae

    Comment by Mohinder Kumar | April 14, 2007

  2. विरह की पीड़ा से ही उपजती है यह रचनात्मक ऊर्जा .

    Comment by प्रियंकर | April 16, 2007

  3. शुक्रिया प्रियंकर जी , अपनी राय प्रेषित करने के लिए…..

    रमा द्विवेदी

    Comment by ramadwivedi | April 17, 2007

  4. रमा दीदी नमस्कार,बहुत समय बाद आज फ़िर आपके ब्लाग की कविताएं पढ रही हूँ,…काफ़ी समय से जिन्दगी में एक भटकाव महसुस कर रही हूँ,..वो है ना मन पखेरू उड़ जाता है,..आपकी कविताएं सदैव ही प्रेरक रही है,…आपकी कविता ही कि तरह जैसे,…
    तुम्हारा विरह भी मुझे,

    देता है असीम शक्ति,

    पीड़ा के ऐसे ही क्षणों में तो

    मैनें कई-कई सृजन किए हैं।
    स्नेह हमेशा बनाए रखिए,..हमेशा आपकी कविताएं मुझे पढने को मिलती रहें बस यही मंगल कामना है
    सुनीता(शानू)

    Comment by सुनीता(शानू) | April 18, 2007

  5. डा. रमा द्विवेदी ……..

    सुनीता जी,

    ब्लाग पर आने और कविता पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया …..उम्मीद है यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा……सस्नेह…

    डा. रमा द्विवेदी

    Comment by ramadwivedi | April 19, 2007

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