ये बेशुमार तन्हाईयां,
शायद मेरे ह्रिदय व मस्तिष्क की,
बंद खिड़कियां खोल दें,
और मैं कुछ ऐसा कर जाऊं,
लिख जाऊं कुछ अमर पंक्तियां,
जो संयोग के क्षणों में,
मैं न लिख पाई।
तुम्हारा विरह भी मुझे,
देता है असीम शक्ति,
पीड़ा के ऐसे ही क्षणों में तो
मैनें कई-कई सृजन किए हैं।
डा. रमा द्विवेदी
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बेशुमार तन्हाईयां
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Sunder likha hae
Sirjan ke liye tanhaayee badi aawashyak hae
विरह की पीड़ा से ही उपजती है यह रचनात्मक ऊर्जा .
शुक्रिया प्रियंकर जी , अपनी राय प्रेषित करने के लिए…..
रमा द्विवेदी
रमा दीदी नमस्कार,बहुत समय बाद आज फ़िर आपके ब्लाग की कविताएं पढ रही हूँ,…काफ़ी समय से जिन्दगी में एक भटकाव महसुस कर रही हूँ,..वो है ना मन पखेरू उड़ जाता है,..आपकी कविताएं सदैव ही प्रेरक रही है,…आपकी कविता ही कि तरह जैसे,…
तुम्हारा विरह भी मुझे,
देता है असीम शक्ति,
पीड़ा के ऐसे ही क्षणों में तो
मैनें कई-कई सृजन किए हैं।
स्नेह हमेशा बनाए रखिए,..हमेशा आपकी कविताएं मुझे पढने को मिलती रहें बस यही मंगल कामना है
सुनीता(शानू)
डा. रमा द्विवेदी ……..
सुनीता जी,
ब्लाग पर आने और कविता पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया …..उम्मीद है यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा……सस्नेह…
डा. रमा द्विवेदी