कहने को इक्कीसवीं सदी,पर
बर्बरता का नंगा नाच यहां।
सभ्यता यहां पर बनी है बंदी,
अब तक भी नारी का उपहास यहां॥नारी की यातनाओं का,कभी न -
खत्म होने वाला सिलसिला।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे जब,
तब फिर किससे करें गिला॥एक है देवी, दूसरा दानव,
कैसे हो सकता है मेल भला?
देवी-असुर संग्राम चल रहा,
किसकी होगी जीत यहां ॥महाभारत तो कुछ दिन चला था,
सदियों का संग्राम है यह।
दुष्टों के उत्पातों का,
दुष्परिणाम भुगतता समाज है यह॥डा. रमा द्विवेदी
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सभ्यता बंदी है
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Hello Madam,
काफी दिनों बाद आपका लिखा पढ रहा हूँ…बहुत व्यापक रूप में मानवता को ललकारा है…।
महावीर सर के ब्लाग पर हमेशा आपका लेख देखता हूँ। सुंदर कविता औरों को भी देखनी चाहिए।
sunder hae.. likhte rahiye
दिव्याभ जी,
आपके स्नेह के लिए बहुत आभारी हूं…आशा हैआगे भी आप मेरी कविताओं पर अपने विचार अवश्य देगे…इसी कामना के साथ……
डा. रमा द्विवेदी
shukriya …Mohindar jee..
Dr. Rama Dwivedi
नहीं रमा जी, न तो स्त्रियाँ देवी हैं न ही उन्हें देवी बनने की चेष्टा करनी चाहिए । पुरुष भी दानव नहीं है । दोनों ही मानव हैं ,व्यक्ति हैं और वही बने रहने का यत्न करना चाहिए । आवश्यकता है तो केवल कुछ सोच में बदलाव की ।
घुघूती बासूती
बासूती जी,
प्रथम तो आपका मेरे ब्लाग में स्वागत है….अगर दोनों ही मानव हैं तो ऐसा क्यों हो रहा है कि पुरुष अपनी मर्यादाओं को भूल चुका है…स्वछन्द विचरण-आचरण कर रहा है…अपनी ही बहू-बेटी का रक्षक न बन कर भक्षक बन रहा है यह दानव के ही कार्य हैं व्यक्ति अपने कर्मों से ही इन्सान बनता है अगर इन्सान के गुण ही न हों तब? स्त्रियां देवी बनती नहीं उन्हें बनाया जाता है… अगर पुरुष प्रधान समाज ने उन्हें मानव समझा होता तो हमारे समाज में यह विड़म्बना कभी न होती…..मैं यह नहीं कहती कि हर पुरुष ऐसा है लेकिन आज भी अधिकतर स्त्रियों का शोषण होता है….इसमें कुछ दोष स्त्रियों का भी हो सकता है और अक्सर यह दोष नहीं भी होता…शायद यह आपको भी पता ही होगा..कहने की जरूरत नहीं है…जिस दिन पुरुष ,नारी को इन्सान समझने लगेगा उस दिन समाज की बहुत सारी विडम्बनाएं अपने आप ही समाप्त हो जायेगी….इस पर बहुत चर्चा हो सकती है…फिर कभी बात करेगे… आपके विचारों को जानकर अच्छा लगा….आभार सहित…..
डा. रमा द्विवेदी