अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

मुझको हरित बनाओ अब…

          यह धरती अकुला रही , हमें तुम्हें बुला रही,
          मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।

          लगाओ पेड़-पौधे तुम , प्रदूषण को भगाओ तुम,
         पाओगे ताजी हवा , रोगों से मुक्ति पाओ तुम,
         चेहरा रहे खिला-खिला यही हमें बता रही…
         मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।

         जिसने दिया तुम्हें जन्म है उसको न यूं सताओ तुम,
         जन्मने का हक़ उसे भी दो यूं भ्रूण न मिटाओ तुम,
         सिष्टि चलेगी उससे ही ,बस बात यह बता रही…
         मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।

         मुझ पर बनाते घर-मकां , मुझ पर बनाते हो महल,
         मुझ पर उगाते अन्न-फल, मुझे  रौंदते हो हर पहर,
         मुझमें मिलोगे अन्त में , बस बात यह समझा रही….
         मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।

         सदियों से रुदन कर रही , न सिसकियां तुमने सुनी ,
         जर्जर हुई हर सांस है , टूटेगी जाने किस घड़ी ,
         चेतावनी यह समझो प्रलय की घड़ी आ रही….
         मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।

          इतना  सताओ न मुझे दुनिया में क़हर ढ़ाऊं मैं,
         अपनी नहीं चिन्ता मुझे कैसे तुम्हें बचाऊं मैं ,
         इंसान ही के वास्ते , मैं खुद को थी मिटा रही….
         मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।

          मुझ पर बढ़ा जो भार है ,उसको जरा घटाओ तुम ,
         आतंक को तुम रोक दो , यूं रक्त न बहाओ तुम ,
         खुशहाल हों सबही यहां , मैं मन्नतें मना रही…
         मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।

               डा. रमा द्विवेदी
            © All Rights Reserved

          

April 23, 2007 - Posted by ramadwivedi | गीत | | 15 Comments

15 Comments »

  1. रमा जीं
    आज आपके रचनाये पढ़कर अच्छा लगा । आपको बधाई , सयोंग्वश मैंने भी आज राजलेख का हिन्दी चिट्ठा में इसी विषय पर लेख लिखा था।
    दीपक राज

    Comment by deepak | April 23, 2007

  2. धरा दिवस पर इस बेहतरीन रचना का स्वागत है. बधाई स्विकारें.

    -समीर लाल

    Comment by समीर लाल | April 23, 2007

  3. दीपक जी,

    शुक्रिया….कविता पढ़ने के लिये….आशा है आगे भी पढ़ते रहेंगे…

    रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | April 23, 2007

  4. समीर जी,
    आपको रचना पसन्द आयी उसके लिए आभारी हूं….

    रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | April 23, 2007

  5. प्रेरणात्मक रचना, सुन्दर…बहुत अच्छा लगा पढ कर…
    बधायी हो आप को रमा जी.

    Comment by Mohinder Kumar | April 24, 2007

  6. पृथ्वी की हरियाली हो रही तार तार
    दहकती लाली बेहाली बढ़ रही अपार।

    पिघलते ध्रव और हिमालय करे पुकार
    बचो, बचाओ, सुनो प्रलय की ललकार।।

    Comment by हरिराम | April 24, 2007

  7. पृथ्वी की हरियाली हो रही तार तार
    दहकती लाली बेहाली बढ़ रही अपार।

    पिघलते ध्रुव और हिमालय करे पुकार
    बचो, बचाओ, सुनो प्रलय की ललकार।।

    Comment by हरिराम | April 24, 2007

  8. मोहिन्दर जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका… पढ़ते रहियेगा…

    हरीराम जी,आपकी पंक्तियां पढ़कर बहुत अच्छा लगा….अच्छा लिखते हैं…बधाई…आभारसहित…

    डा. रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | April 24, 2007

  9. रमा जी,
    अब हरियालि नहीं बनेगा, बनेगा बंगाल में टाटा के car, ओरीसा में steel, केरल में IT park आदी।
    फसलें करेगा खतम GM seeds
    खाने केलिए GM food
    प्यार करो plastic से जो खूबसूरत हैं।
    चलाओ मोटर गाडि फूको Carbon monoxide
    इस्तेमाल करें रासायनिक Nitrogen और मारो Earthworms
    मट्टी मरने की तैयारी कर रहे हैं।

    Comment by चन्द्रशेखरन नायर | April 24, 2007

  10. हरिराम जी,
    पिघलते हिमालय करे गंगा और यमुना साफ।
    पिघलते ध्रुव करे समुन्दर की जहर कम।

    Comment by चन्द्रशेखरन नायर | April 24, 2007

  11. चन्द्रशेखरन जी,

    आपका मेरे ब्लाग में स्वागत है…..आपने जो लिखा है सही लिखा है …इसलिए तो संकट पैदा हो गया है…बहुत बहुत आभार सहित…आगे भी अपने विचारों से अवगत कराते रहियेगा.

    डा. रमा द्विवेदी

    Comment by ramadwivedi | April 25, 2007

  12. बहुत ही मार्मिक पंक्तियों में मानव को केवल चेतावनी ही नहीं, परामर्श भी दिया है।
    कितना बड़ा सत्य हैः
    मुझ पर बनाते घर-मकां , मुझ पर बनाते हो महल,
    मुझ पर उगाते अन्न-फल, मुझे रौंदते हो हर पहर,
    मुझमें मिलोगे अन्त में , बस बात यह समझा रही….
    मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।
    यदि मानव फिर भी ना समझ पाये तो प्रलय को आमंत्रित कर रहा है।
    सदियों से रुदन कर रही , न सिसकियां तुमने सुनी ,
    जर्जर हुई हर सांस है , टूटेगी जाने किस घड़ी ,
    चेतावनी यह समझो प्रलय की घड़ी आ रही….
    मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।
    इस सुंदर रचना के लिए बधाई!

    Comment by महावीर | April 26, 2007

  13. आदरणीय महावीर जी,

    इस गीत को भी आपका आशीर्वाद प्राप्त हो गया बस लेखनी को एक नवीन स्फूर्ति मिल गई….आप जैसे विद्वान साहित्यकारों के अमूल्य विचार मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं….ह्रिदय से आभारी हूं … सादर….

    रमा द्विवेदी

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | April 27, 2007

  14. nice feelings

    Comment by rajesh | May 8, 2007

  15. Rajesh ji,
    Bahut bahut Shukriya….

    Dr. Rama Dwivedi

    Comment by ramadwivedi | May 8, 2007

Leave a comment