मुझको हरित बनाओ अब…
यह धरती अकुला रही , हमें तुम्हें बुला रही,
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।लगाओ पेड़-पौधे तुम , प्रदूषण को भगाओ तुम,
पाओगे ताजी हवा , रोगों से मुक्ति पाओ तुम,
चेहरा रहे खिला-खिला यही हमें बता रही…
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।जिसने दिया तुम्हें जन्म है उसको न यूं सताओ तुम,
जन्मने का हक़ उसे भी दो यूं भ्रूण न मिटाओ तुम,
सिष्टि चलेगी उससे ही ,बस बात यह बता रही…
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।मुझ पर बनाते घर-मकां , मुझ पर बनाते हो महल,
मुझ पर उगाते अन्न-फल, मुझे रौंदते हो हर पहर,
मुझमें मिलोगे अन्त में , बस बात यह समझा रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।सदियों से रुदन कर रही , न सिसकियां तुमने सुनी ,
जर्जर हुई हर सांस है , टूटेगी जाने किस घड़ी ,
चेतावनी यह समझो प्रलय की घड़ी आ रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।इतना सताओ न मुझे दुनिया में क़हर ढ़ाऊं मैं,
अपनी नहीं चिन्ता मुझे कैसे तुम्हें बचाऊं मैं ,
इंसान ही के वास्ते , मैं खुद को थी मिटा रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।मुझ पर बढ़ा जो भार है ,उसको जरा घटाओ तुम ,
आतंक को तुम रोक दो , यूं रक्त न बहाओ तुम ,
खुशहाल हों सबही यहां , मैं मन्नतें मना रही…
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।डा. रमा द्विवेदी
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रमा जीं
आज आपके रचनाये पढ़कर अच्छा लगा । आपको बधाई , सयोंग्वश मैंने भी आज राजलेख का हिन्दी चिट्ठा में इसी विषय पर लेख लिखा था।
दीपक राज
धरा दिवस पर इस बेहतरीन रचना का स्वागत है. बधाई स्विकारें.
-समीर लाल
दीपक जी,
शुक्रिया….कविता पढ़ने के लिये….आशा है आगे भी पढ़ते रहेंगे…
रमा द्विवेदी
समीर जी,
आपको रचना पसन्द आयी उसके लिए आभारी हूं….
रमा द्विवेदी
प्रेरणात्मक रचना, सुन्दर…बहुत अच्छा लगा पढ कर…
बधायी हो आप को रमा जी.
पृथ्वी की हरियाली हो रही तार तार
दहकती लाली बेहाली बढ़ रही अपार।
पिघलते ध्रव और हिमालय करे पुकार
बचो, बचाओ, सुनो प्रलय की ललकार।।
पृथ्वी की हरियाली हो रही तार तार
दहकती लाली बेहाली बढ़ रही अपार।
पिघलते ध्रुव और हिमालय करे पुकार
बचो, बचाओ, सुनो प्रलय की ललकार।।
मोहिन्दर जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका… पढ़ते रहियेगा…
हरीराम जी,आपकी पंक्तियां पढ़कर बहुत अच्छा लगा….अच्छा लिखते हैं…बधाई…आभारसहित…
डा. रमा द्विवेदी
रमा जी,
अब हरियालि नहीं बनेगा, बनेगा बंगाल में टाटा के car, ओरीसा में steel, केरल में IT park आदी।
फसलें करेगा खतम GM seeds
खाने केलिए GM food
प्यार करो plastic से जो खूबसूरत हैं।
चलाओ मोटर गाडि फूको Carbon monoxide
इस्तेमाल करें रासायनिक Nitrogen और मारो Earthworms
मट्टी मरने की तैयारी कर रहे हैं।
हरिराम जी,
पिघलते हिमालय करे गंगा और यमुना साफ।
पिघलते ध्रुव करे समुन्दर की जहर कम।
चन्द्रशेखरन जी,
आपका मेरे ब्लाग में स्वागत है…..आपने जो लिखा है सही लिखा है …इसलिए तो संकट पैदा हो गया है…बहुत बहुत आभार सहित…आगे भी अपने विचारों से अवगत कराते रहियेगा.
डा. रमा द्विवेदी
बहुत ही मार्मिक पंक्तियों में मानव को केवल चेतावनी ही नहीं, परामर्श भी दिया है।
कितना बड़ा सत्य हैः
मुझ पर बनाते घर-मकां , मुझ पर बनाते हो महल,
मुझ पर उगाते अन्न-फल, मुझे रौंदते हो हर पहर,
मुझमें मिलोगे अन्त में , बस बात यह समझा रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।
यदि मानव फिर भी ना समझ पाये तो प्रलय को आमंत्रित कर रहा है।
सदियों से रुदन कर रही , न सिसकियां तुमने सुनी ,
जर्जर हुई हर सांस है , टूटेगी जाने किस घड़ी ,
चेतावनी यह समझो प्रलय की घड़ी आ रही….
मुझको हरित बनाओ अब , पुकार यह लगा रही ।
इस सुंदर रचना के लिए बधाई!
आदरणीय महावीर जी,
इस गीत को भी आपका आशीर्वाद प्राप्त हो गया बस लेखनी को एक नवीन स्फूर्ति मिल गई….आप जैसे विद्वान साहित्यकारों के अमूल्य विचार मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं….ह्रिदय से आभारी हूं … सादर….
रमा द्विवेदी
nice feelings
Rajesh ji,
Bahut bahut Shukriya….
Dr. Rama Dwivedi