१- माया के माया-महल में,
सत्य भी छुप जाते हैं।
दुर्योधन की एक फिसलन ,
कुरुक्षेत्र भी रच जाते हैं॥२- माया के ही इक हास्य ने,
महाभारत रच दिया।
दुर्योधन के अति-अहं ने,
कोहराम चहुदिशि कर दिया॥३- माया का यह प्रतिकार था,
यह कैसा अत्याचार था?
मूक बन बैठे रहे सब,
बस एक चीत्कार था॥४ - हिल गया शिव का सिंहासन,
कृष्ण दौडे आये थे।
सृष्टिकर्ता ने आँख खोली,
चीख सुन घबराये थे ॥५- कृष्णा नाम पड़ गया तब ,
प्यारी सखी थी कृष्ण की।
उसनें कर दी थी समर्पित,
अपनी सारी भक्ति भी॥६- भीष्म की भीषम प्रतिज्ञा,
सर झुकाए रह गई।
आचार्यों की आदर्श-शिक्षा,
वारि बन कर बह गई७- देख सकती थी नहीं,गांधारी,
अपनों के बहते रक्त को।
बांध ली आँखों में पट्टी,
तब जी सकी इस सत्य को॥८- पांच पति भी कर सके ना,
रक्षा जब सम्मान की।
द्रौपदी ने केश खोले,
रक्त की तब मांग की॥९- मार कर दु:शासन को,
जब रक्त लेकर आओगे।
कर मैं दूँगी तब क्षमा,
सच्चे पति कहलाओगे॥१०- भीम ने तब प्रण किया,
पूरा करूँगा मैं संकल्प को।
दु:शासन की चीर छाती,
लाऊँगा उसके रक्त को॥११- कृष्णा के कारण ही तो,
कृष्ण सारथी बन गए थे।
कृष्णा के प्रतिशोध में,
हरदम ही उसके साथ थे॥१२- कौरवों की शक्ति और-
सामर्थ्य भी कुछ कम न थी।
किन्तु बस इक ही कमी थी,
कृष्ण से वह विमुख थी॥१३- धृतराष्ट्र की धृष्टता की,
क्या सज़ा मिल पाई थी?
शकुनी की चालाकियाँ भी,
वंशज बचा न पाईं थी॥१४- कृष्ण ने विजयी बनाया,
कृष्णा के संकल्प को।
हार जाते पांडव भी,
अगर न होते साथ वो॥(’माया’ की श्रृंखला में ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)
डा. रमा द्विवेदी
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” माया” श्रृंखला -१( कुछ मुक्तक)
मन का मिलन
यह माना नहीं है,
हुनर कोई मुझमें,
मगर एक दिल था ,
तुम्हें दे दिया है।नहीं रूपसी मैं,
न तन की अदाएं,
मगर एक मन था ,
तुम्हें दे दिया है।न बंधन रिवाजों के,
न कोई सनद ही,
यह दिल का मिलन था,
तुम्हें दे दिया है।न की अर्चनाएं ,
न अग्नि के फेरे,
मगर इक वचन था,
तुम्हें दे दिया है।न भाषा नयन की,
न शब्दों की लडियां,
मगर मौन इक था,
तुम्हें दे दिया है।न देखे थे सपने ही,
कोई महल के,
मगर इक स्वपन था,
तुम्हें दे दिया है।डा. रमा द्विवेदी
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‘प्यार’ संजो कर रखो
१- ” प्यार” जी हां प्यार भी
दिल की मुठ्ठी में ,
संजोंकर रखने की चीज है,
जमाने की हर बुरी नज़र से ,
बचा कर रखने चीज है,
कहीं जमाने की नज़र न लग जाए?
क्योंकि-जमाना हमेशा से प्यार का
दुशमन ही तो रहा है।२- प्यार एक संवेदना है,
एक ज़ज़्बा,एक अहसास है,
जिसे संसार भर के शब्दकोश भी,
परिभाषित नहीं कर सकते}प्यार से पगे शब्द,
रूखे अधरों पर
मुस्कान खिला देते हैं,
रोती आंखों को भी हंसा देते हैं,
प्यार की बारिस,
ऊसर धरा को भी ,
उर्वरा बना देती है,
प्यार की छुअन,
सांसो को स्पंदित कर
जीने की चाह जगा देती है।३- प्यार का अहसास,
हर संघर्ष से
जूझने की शक्ति देता है
और प्यार ही तो,
हर बेडियों को तोड़ कर,
प्रेमियों को अमर बना देता है।प्यार में असीम शक्ति है,
जिसके सहारे परम्पराओं के-
बंधनों की बेड़ियां तोड़कर,
कोई सोनी कर जाती है दरिया पार,
अपने महिवाल के लिए,
उसे यह भी होश नहीं रहता,
कि कोई अपना उसके साथ फ़रेब न कर दे,
जो प्यार के लिए मरने का,
हौसला रखते हैं,बस वे ही,
प्यार कर सकते हैं॥डा. रमा द्विवेदी
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प्रकृति भी कितनी क्रूर है?
कैसी घटा घनघोर ये,
बरसी सी है इतनी जोर से।
पलभर में जल ही जल हुआ,
मुंबई को रख दी बोर के॥कोई तो छत पे चढ़ गया,
कोई तो जल में धंस गया।
कोई पुकारे त्राहि-त्राहि ,
यम सामने कठोर है॥कोई भूख से बेचैन है,
कोई प्यास से बेहाल है।
बच्चे सिसकियां भर रहे,
और मां भी तो मजबूर है॥जोड़ा था धन जतन से जो,
सब बह गया बिन यतन के वो।
दिल चीखता ही रह गया,
चलता न कोई जोर है॥सूरज कहीं दुबक गया,
और वक़्त भी सहम गया।
रात भी ठिठुर गई,
प्रकृति भी कितनी क्रूर है॥कहने को तो पानी ही था,
पर रच गया कहानी था।
सागर उफनता घर घुसा,
मेंघों का यह प्रकोप है॥डा. रमा द्विवेदी
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कुछ न जुटा पाईं नारियां (गीत)
क्यों ज़ुल्मों को ही झेलती रहीं हैं नारियां?
क्यों नहीं आवाज उठा पाईं नारियां?नारी के बिना पुरुष क्या है? ईश अधूरा,
फिर क्यों नहीं सम्मान से जी पाईं नारियां?
क्यों ज़ुल्मों को ही झेलती रहीं हैं नारियां?लोगों ने उसे पूजा है देवी बनाकर,
पर क्यों नहीं इंसान बन पाईं नारियां?
क्यों ज़ुल्मों को ही झेलती रहीं हैं नारियां?सदियों से कष्ट भोगती रही हैं नारियां,
फिर क्यों नहीं विद्रोह कर पाईं नारियां?
क्यों ज़ुल्मों को ही झेलती रहीं हैं नारियां?नारी ने अपनी शक्ति से है विश्व संवारा,
पर खुद के लिए कुछ न जुटा पाईं नारियां?
क्यों ज़ुल्मों को ही झेलती रहीं हैं नारियां?नारी तुझे टकराना होगा इस समाज से,
अगर स्वाभिमान से तुम्हें जीना है नारियां।
क्यों ज़ुल्मों को ही झेलती रहीं हैं नारियां?नारी तुम अपनी शक्ति से नव-इतिहास रचाओ,
कदम प्रगति की ओर बढ़ाओ हे नारियां।
क्यों ज़ुल्मों को ही झेलती रहीं हैं नारियां?डा. रमा द्विवेदी
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