‘प्यार’ संजो कर रखो
May 27, 2007 at 5:16 am (क्षणिकाएं)
१- ” प्यार” जी हां प्यार भी
दिल की मुठ्ठी में ,
संजोंकर रखने की चीज है,
जमाने की हर बुरी नज़र से ,
बचा कर रखने चीज है,
कहीं जमाने की नज़र न लग जाए?
क्योंकि-जमाना हमेशा से प्यार का
दुशमन ही तो रहा है।२- प्यार एक संवेदना है,
एक ज़ज़्बा,एक अहसास है,
जिसे संसार भर के शब्दकोश भी,
परिभाषित नहीं कर सकते}प्यार से पगे शब्द,
रूखे अधरों पर
मुस्कान खिला देते हैं,
रोती आंखों को भी हंसा देते हैं,
प्यार की बारिस,
ऊसर धरा को भी ,
उर्वरा बना देती है,
प्यार की छुअन,
सांसो को स्पंदित कर
जीने की चाह जगा देती है।३- प्यार का अहसास,
हर संघर्ष से
जूझने की शक्ति देता है
और प्यार ही तो,
हर बेडियों को तोड़ कर,
प्रेमियों को अमर बना देता है।प्यार में असीम शक्ति है,
जिसके सहारे परम्पराओं के-
बंधनों की बेड़ियां तोड़कर,
कोई सोनी कर जाती है दरिया पार,
अपने महिवाल के लिए,
उसे यह भी होश नहीं रहता,
कि कोई अपना उसके साथ फ़रेब न कर दे,
जो प्यार के लिए मरने का,
हौसला रखते हैं,बस वे ही,
प्यार कर सकते हैं॥डा. रमा द्विवेदी
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समीर लाल said,
May 27, 2007 at 2:41 pm
सुंदर अहसास.
divyabh said,
May 27, 2007 at 4:07 pm
प्रेम तो अवर्णनी है…जिसने इसके अहसास को छूआ वह परमात्मा ही हो गया…।
यहाँ भी काफी सुंदर रुप में सारे तत्वों को समाहित किया गया है…।
ghughutibasuti said,
May 27, 2007 at 6:56 pm
सही कहा आपने । बहुत सुन्दर लिखा है ।
घुघूती बासूती
paramjitbali said,
May 27, 2007 at 6:57 pm
अच्छा एहसास है।प्यार अतुल्नीय है।
ramadwivedi said,
May 28, 2007 at 7:18 am
समीर जी,
शुक्रिया ..अपनी राय देने के लिए।
दिव्याभ जी,
आपकी तत्परता देखकर वास्तव में बहुत अच्छा लगता है….आभार सहित।
बासुती जी,
आपको रचना पसन्द आई बस मेरा लेखन सार्थक हो गया….धन्यवाद सहित।
परमजीत बाली जी,
प्यार सर्वोपरि है ….इसलिए अतुलनीय भी है…आपके विचार जानकर अच्छा लगा…आभार सहित
डा. रमा द्विवेदी