मन का मिलन

             यह माना नहीं है,
             हुनर कोई मुझमें,
             मगर एक दिल था ,
             तुम्हें दे दिया है।

             नहीं रूपसी मैं,
             न तन की अदाएं,
             मगर एक मन था ,
             तुम्हें दे दिया है।

              न बंधन रिवाजों के,
             न कोई सनद ही,
             यह दिल का मिलन था,
             तुम्हें दे दिया है।

              न की अर्चनाएं ,
             न अग्नि के फेरे,
             मगर इक वचन था,
             तुम्हें दे दिया है।

              न भाषा नयन की,
             न शब्दों की लडियां,
             मगर मौन इक था,
             तुम्हें दे दिया है।

               न देखे थे सपने ही,
             कोई महल के,
             मगर इक स्वपन था,
             तुम्हें दे दिया है।

                डा. रमा द्विवेदी 
               © All Rights Reserved

14 Comments

  1. विकास said,

    May 27, 2007 at 6:49 am

    “न की अर्चनाएं ,
    न अग्नि के फेरे,
    मगर इक वचन था,
    तुम्हें दे दिया है।”

    अच्छा लगा।

  2. डा. रमा द्विवेदी said,

    May 27, 2007 at 8:22 am

    विकास जी,

    प्रथम तो आपका स्वागत है मेरे ब्लाग पर आने के लिए……कविता अच्छी लगी …बहुत बहुत धन्यवाद….आगे भी अपने विचारों से अवगत कराते रहिएगा….

    रमा द्विवेदी

  3. सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said,

    May 27, 2007 at 10:03 am

    बहुत ही अच्छा गीत है। नाजुक संवेदनाओँ से लवरेज। बधाई हो।

  4. reetesh gupta said,

    May 27, 2007 at 12:31 pm

    बहुत अच्छी लगी आपकी रचना…. बधाई

  5. सारथी: काव्य अवलोकन 1 : सारथी said,

    May 27, 2007 at 2:15 pm

    [...] यह माना नहीं है,हुनर कोई मुझमें,मगर एक दिल था ,तुम्हें दे दिया है। नहीं रूपसी मैं,न तन की अदाएं,मगर एक मन था ,तुम्हें दे दिया है। [पूरी कविता पढें …] [...]

  6. समीर लाल said,

    May 27, 2007 at 2:39 pm

    न देखे थे सपने ही,
    कोई महल के,
    मगर इक स्वपन था,
    तुम्हें दे दिया है।

    वाह वाह, एकदम पूर्ण बहाव के साथ एक खुबसूरत अभिव्यक्ति. बहुत बहुत बधाई.

  7. divyabh said,

    May 27, 2007 at 4:01 pm

    प्रपंच शून्य मन की धारा का व्यापक वर्णन…इस पवित्रता और शाश्वता में जो
    आशा की किरण है वही परम है…बहुत सुंदर अभिव्यक्ति!!!

  8. सारथी: काव्य अवलोकन 1 : सारथी said,

    May 27, 2007 at 5:47 pm

    [...] यह माना नहीं है, हुनर कोई मुझमें, मगर एक दिल था , तुम्हें दे दिया है। नहीं रूपसी मैं, न तन की अदाएं, मगर एक मन था , तुम्हें दे दिया है। [पूरी कविता पढें …] [...]

  9. अमित said,

    May 27, 2007 at 6:27 pm

    बहुत खूबसूरत रचना रमा जी. सरल से शब्दों में इतनी गहरी बात कही आपने.

    “न भाषा नयन की,
    न शब्दों की लडियां,
    मगर मौन इक था,
    तुम्हें दे दिया है।”

    इन पंक्तियों के लिये मेरा भी मौन स्वीकार करें.

  10. paramjitbali said,

    May 27, 2007 at 6:59 pm

    बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना है।बधाई।

  11. ramadwivedi said,

    May 28, 2007 at 7:08 am

    सत्येन्द्र जी,

    प्रथम तो आपका स्वागत है…मेरे ब्लाग में आने के लिए….कविता अच्छी लगी उसके लिए बहुत बहुत आभार।

    रीतेश जी,

    कविता पसन्द आई …बहुत बहुत शुक्रिया..

    सारथी जी,

    आपने अपने ब्लाग पर रचना को लगाया है उसके लिए हार्दिक आभार..

    समीर जी,

    आपके विचार बहुत अच्छे लगे…..आभार सहित….

    दिव्याभ जी,

    हमेशा की तरह कुछ अलग आपके विचार मन को छू गये…आभारी हूं..

    अमित जी,

    आपका आना और कुछ मौन में कह जाना अच्छा लगा….आभार सहित..

    परमजीत बाली जी,

    कविता पसन्द आई …बस यही मेरे लिए बहुत है….धन्यवाद सहित..

    डा. रमा द्विवेदी

  12. kanchan chouhan said,

    June 22, 2007 at 9:50 am

    यह माना नहीं है,
    हुनर कोई मुझमें,
    मगर एक दिल था ,
    तुम्हें दे दिया है।

    नहीं रूपसी मैं,
    न तन की अदाएं,
    मगर एक मन था ,
    तुम्हें दे दिया है।
    वैसे आप ही कहें कि मैं किन पंक्तियों को qoute करूँ, कितनी सहजता से, कितनी गहरी, कितनी भावपूर्ण बातें कही आपने बहुत खूब !

  13. kanchan chouhan said,

    June 22, 2007 at 9:56 am

    यह माना नहीं है,
    हुनर कोई मुझमें,
    मगर एक दिल था ,
    तुम्हें दे दिया है।

    नहीं रूपसी मैं,
    न तन की अदाएं,
    मगर एक मन था ,
    तुम्हें दे दिया है।
    वैसे आप ही कहें कि मैं किन पंक्तियों को qoute करूँ, कितनी सहजता से, कितनी गहरी, कितनी भावपूर्ण बातें कही आपने बहुत खूब !

  14. डा. रमा द्विवेदी said,

    June 22, 2007 at 3:48 pm

    कंचन जी,

    प्रथम तो अनुभूति कलश में आपका स्वागत है…..आपको कविता पसन्द आई….अच्छा लगा…. मैंने तो अपने मन की बात कही है अगर वह आपकी भी पसन्द बन जाती है तो यह मेरा सौभाग्य है….बहुत बहुत आभार…..आशा है अन्य रचनाओं पर भी अपने विचार प्रस्तुत करेंगी….

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