मन का मिलन

             यह माना नहीं है,
             हुनर कोई मुझमें,
             मगर एक दिल था ,
             तुम्हें दे दिया है।

             नहीं रूपसी मैं,
             न तन की अदाएं,
             मगर एक मन था ,
             तुम्हें दे दिया है।

              न बंधन रिवाजों के,
             न कोई सनद ही,
             यह दिल का मिलन था,
             तुम्हें दे दिया है।

              न की अर्चनाएं ,
             न अग्नि के फेरे,
             मगर इक वचन था,
             तुम्हें दे दिया है।

              न भाषा नयन की,
             न शब्दों की लडियां,
             मगर मौन इक था,
             तुम्हें दे दिया है।

               न देखे थे सपने ही,
             कोई महल के,
             मगर इक स्वपन था,
             तुम्हें दे दिया है।

                डा. रमा द्विवेदी 
               © All Rights Reserved

Published in: on May 27, 2007 at 5:28 am Comments (14)

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14 Comments Leave a comment.

  1. “न की अर्चनाएं ,
    न अग्नि के फेरे,
    मगर इक वचन था,
    तुम्हें दे दिया है।”

    अच्छा लगा।

  2. विकास जी,

    प्रथम तो आपका स्वागत है मेरे ब्लाग पर आने के लिए……कविता अच्छी लगी …बहुत बहुत धन्यवाद….आगे भी अपने विचारों से अवगत कराते रहिएगा….

    रमा द्विवेदी

  3. बहुत ही अच्छा गीत है। नाजुक संवेदनाओँ से लवरेज। बधाई हो।

  4. बहुत अच्छी लगी आपकी रचना…. बधाई

  5. [...] यह माना नहीं है,हुनर कोई मुझमें,मगर एक दिल था ,तुम्हें दे दिया है। नहीं रूपसी मैं,न तन की अदाएं,मगर एक मन था ,तुम्हें दे दिया है। [पूरी कविता पढें …] [...]

  6. न देखे थे सपने ही,
    कोई महल के,
    मगर इक स्वपन था,
    तुम्हें दे दिया है।

    वाह वाह, एकदम पूर्ण बहाव के साथ एक खुबसूरत अभिव्यक्ति. बहुत बहुत बधाई.

  7. प्रपंच शून्य मन की धारा का व्यापक वर्णन…इस पवित्रता और शाश्वता में जो
    आशा की किरण है वही परम है…बहुत सुंदर अभिव्यक्ति!!!

  8. [...] यह माना नहीं है, हुनर कोई मुझमें, मगर एक दिल था , तुम्हें दे दिया है। नहीं रूपसी मैं, न तन की अदाएं, मगर एक मन था , तुम्हें दे दिया है। [पूरी कविता पढें …] [...]

  9. बहुत खूबसूरत रचना रमा जी. सरल से शब्दों में इतनी गहरी बात कही आपने.

    “न भाषा नयन की,
    न शब्दों की लडियां,
    मगर मौन इक था,
    तुम्हें दे दिया है।”

    इन पंक्तियों के लिये मेरा भी मौन स्वीकार करें.

  10. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना है।बधाई।

  11. सत्येन्द्र जी,

    प्रथम तो आपका स्वागत है…मेरे ब्लाग में आने के लिए….कविता अच्छी लगी उसके लिए बहुत बहुत आभार।

    रीतेश जी,

    कविता पसन्द आई …बहुत बहुत शुक्रिया..

    सारथी जी,

    आपने अपने ब्लाग पर रचना को लगाया है उसके लिए हार्दिक आभार..

    समीर जी,

    आपके विचार बहुत अच्छे लगे…..आभार सहित….

    दिव्याभ जी,

    हमेशा की तरह कुछ अलग आपके विचार मन को छू गये…आभारी हूं..

    अमित जी,

    आपका आना और कुछ मौन में कह जाना अच्छा लगा….आभार सहित..

    परमजीत बाली जी,

    कविता पसन्द आई …बस यही मेरे लिए बहुत है….धन्यवाद सहित..

    डा. रमा द्विवेदी

  12. यह माना नहीं है,
    हुनर कोई मुझमें,
    मगर एक दिल था ,
    तुम्हें दे दिया है।

    नहीं रूपसी मैं,
    न तन की अदाएं,
    मगर एक मन था ,
    तुम्हें दे दिया है।
    वैसे आप ही कहें कि मैं किन पंक्तियों को qoute करूँ, कितनी सहजता से, कितनी गहरी, कितनी भावपूर्ण बातें कही आपने बहुत खूब !

  13. यह माना नहीं है,
    हुनर कोई मुझमें,
    मगर एक दिल था ,
    तुम्हें दे दिया है।

    नहीं रूपसी मैं,
    न तन की अदाएं,
    मगर एक मन था ,
    तुम्हें दे दिया है।
    वैसे आप ही कहें कि मैं किन पंक्तियों को qoute करूँ, कितनी सहजता से, कितनी गहरी, कितनी भावपूर्ण बातें कही आपने बहुत खूब !

  14. कंचन जी,

    प्रथम तो अनुभूति कलश में आपका स्वागत है…..आपको कविता पसन्द आई….अच्छा लगा…. मैंने तो अपने मन की बात कही है अगर वह आपकी भी पसन्द बन जाती है तो यह मेरा सौभाग्य है….बहुत बहुत आभार…..आशा है अन्य रचनाओं पर भी अपने विचार प्रस्तुत करेंगी….


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