प्रेम पाना चाहते गर गुनगुनाना सीख लो।
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥प्रेमी-मन को जब नहीं तुम जानते-पहचानते,
झूठे अहं को त्याग दो,सच को अपनाना सीख लो..
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥प्रेम भी इक गीत है, तुम इसको गाना सीख लो,
प्रेमी तुम्हें मिल जाएगा बस तुम बुलाना सीख लो…
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥गीत लिखना चाहते गर ग़म उठाना सीख लो,
गीत तो लिख जाएगा,दिल को तपाना सीख लो…
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥सोचकर जो लिक्खा जाए गीत कहलाता न वो,
हृदतंत्री को झन्क्रित जो कर दे ऐसा गीत लिखना सीख लो…
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥प्रेम इक अहसास है,फूलों में खुशबू की तरह,
शर्त है कि फूलों जैसे खिलखिलाना सीख लो..
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥प्रेम अरु प्रेमी में जब अन्तर नज़र आता नहीं,
प्रेम में खुद को मिटाना यह अदा भी सीख लो…
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥प्रेम की मादकता को, ऐसे न तुम सह पाओगे,
लहरों सा उठना-मचलना,यह कला भी सीख लो…
प्रेम में झूमो तुम ऐसे लहलहाना सीख लो॥डा. रमा द्विवेदी
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प्रेम में झूमों तुम ऐसे….
‘ माया’श्रृंखला-७ (कुछ मुक्तक)
१- माया के द्वारा ही तो,
योग्य वर पा जाती हैं।
माया के कारण ही तो,
धूं-धूं कर जल जाती हैं॥२- बाप की पगड़ी के खातिर,
कितने-कितने गरल पी लेती है?
खून पी-पीकर खुद का ही वह,
लाश बनकर जी लेती है॥३- शिव ने पिया था इक बार विष,
‘नीलकंठ’ बन विभूषित हुए।
बदन पर सहस्त्रों नील है जिसके,
अनदेखे-अगणित ही रह गए॥४- तन की क्या बात करें जब,
धड़कनें तक लुट जाती हैं।
अहसासों की कुछ बात करें गर,
अर्थियां उठ जाती हैं॥५- कितनी हैं वे खुशनसीब,
जिनको मिल जाता है क़फ़न?
बेटियां ऐसी भी हैं कुछ?
ज़िन्दा हो जाती हैं दफ़न॥(’माया’ की श्रृंखला में ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)
डा. रमा द्विवेदी
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माया-श्रृंखला-६ (कुछ मुक्तक)
१- संसार के कल्याण हित,
यमुना बनी,सरस्वती बनी।
पापियों के पाप धोके,
मंदाकिनी मैली बनी॥२- राधा बनी,मीरा बनी,
पत्थर कभी वो बन गई।
सीता ने दी अग्नि-परीक्षा,
परित्यक्ता बन,वन को गई॥३- माया बनी मायाविनी,
रूप कितने धर लिए।
असुरों का संहार करके,
मुंड़माल पहन लिए॥४- रक्त-बीज जब-जब हुए,
दुर्गा भी काली बन गई।
रक्त की हर बूंद पीकर,
खप्पर भर कपाली बन गई॥५- आजादी के संग्राम में,
‘रानी’बनी थी चण्डिका।
देखकर उसका युद्ध-कौशल,
शत्रुदल भी दंग था॥६- जीते जी न दे सकी थी,
जन्मभूमि की आन को।
मिट गई थी खुद ही,पर
बेंचा न था स्वाभिमान को॥(’माया’ की श्रृंखला में ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)
डा. रमा द्विवेदी
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‘माया’श्रृंखला -५(कुछ मुक्तक)
१- विश्व के इतिहास में,
माया के पन्ने खास हैं।
युद्ध कितनें हो गए ?
माया का ही इतिहास है॥२- अंग्रेज भी आए यहां,
माया कमाने के लिए।
माया ने घनचक्कर बनाया,
माया को पाने के लिए॥३- जो कुछ कमाया था यहां,
सब कुछ गंवा करके गए।
ब्याज में काला हुआ मुख,
इतिहास काला रच गए॥४- माया का जादू सर चढ़ा,
अब खेलने में कष्ट है।
हार जाते हैं स्वयं ही,
इश्तहार में वे व्यस्त हैं॥५- माया की ही छाया में देखो,
आतंक भी लहलहाया है।
लील जाने को यह सब कुछ,
‘सुरसा’बन जग में छाया है॥(’माया’ की श्रृंखला में ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)
डा. रमा द्विवेदी
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” माया” श्रृंखला -४ ( कुछ मुक्तक)
१- माया से कारोबार है,
माया से ही बाज़ार है।
माया कमाने के लिए,
माया का ही इश्तहार है॥२- माया से ही चूल्हा जले,
माया से ही माया हंसे।
माया से हर रिश्ते जुड़े,
माया के संग सब ही चलें॥३- माया को पाने वास्ते ही,
बेटी-बहिन देते हैं बेंच।
इक पदोन्नति के लिए,
पत्नी को कर देते हैं भेंट॥४- माया पहनाये वस्त्र भी,
माया उतारे वस्त्र भी।
माया से नाचे मल्लिका,
मंच पर निर्वस्त्र भी॥५- माया ने खुद को बेंच ड़ाला,
माया कमाने के लिए।
कोई विपाशा, मंदिरा कोई,
रूप क्या-क्या धर लिए॥(’माया’ की श्रृंखला में ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)
डा. रमा द्विवेदी
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