“माया” श्रृंखला -२ ( कुछ मुक्तक)
१- भक्तों के माया-दान से,
वेंकटेश भी परेशान हैं।
आठो पहर रहते खड़े,
अभिनय भी उनका महान है॥२- सरकार की नज़रों से हरदम,
‘कर’ छुपा लेते हो तुम।
किन्तु अपने पाप धोने को,
मुझपर चढ़ा देते हो तुम॥३- माया की अनुमति के बिना,
आशीष मेरा पा सको ना।
इहलोक की तो बात क्या?
परलोक भी तुम जा सको ना॥४- माया से ही वैभव मेरा,
माया स्वचालित स्वर्ग है।
माया बिना बस नर्क है,
माया बिना सब व्यर्थ है॥५- माया की इस प्रतिद्वन्द्विता में,
अबतक खड़े वेंकटेश हैं।
इन्सान को बतला रहे ,
अब तक भी वे कुछ शेष हैं॥६- माया के अंध-कूप में,
कंठ तक डूबे हो तुम।
मुझको भी बख्सा नहीं,
मुझको भी ले डूबे हो तुम॥(’माया’ की श्रृंखला में ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)
डा. रमा द्विवेदी
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आप के मुक्तक पढ़्कर बहुत आनंद आया। बधाई।
माया अपरंपार है रमा जी। बहुत ही गहरे मुक्तक हैं आपके। बधाई आपको।
*** राजीव रंजन प्रसाद
परमजीत जी एवं राजीव जी,
आपको मुक्तक पसन्द आए….बहुत बहुत आभार सहित….
- डा. रमा द्विवेदी
सारे ही मुक्तक बड़े सुंदर हैं।
इस मुक्तक में बड़ी निडरता से सत्य को उजागर किया हैः-
सरकार की नज़रों से हरदम,
‘कर’ छुपा लेते हो तुम।
किन्तु अपने पाप धोने को,
मुझपर चढ़ा देते हो तुम॥
आदरणीय शर्मा जी,
माया पर इन मुक्तकों पर भी आपका आशीष प्राप्त हुआ…हार्दिक आभार..