अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

” माया” श्रृंखला - ३(कुछ मुक्तक)

   १-     माया से तख्तेताज भी,
            माया बदल दे ताज भी,
            माया पलभर में बदल दे,
            ज़िन्दगी का साज भी॥

   २-    आकूत माया से ही देखो,
           इक अजूबा बन गया।
           मौत दे दी कितनों को?
           पर नाम फिर भी कर गया॥

  ३-     ताज की इक-इक मीनार,
           कितनी लाशों पर टिकी?
           माया का यह मकबरा भी,
           रक्त पी कर बन सकी॥

  ४-     माया की संगमरमर जमीं पर,
           अश्रु-जल दिखता नहीं ।
           हर कोई है फिसल जाता,
           कुछ रीढ़ पर टिकता नहीं॥

   ५-    अश्रु भी बिक जाते हैं,
           माया के दरबार में।
          चीखों का कितना मूल्य है?
           सांसों के व्यापार में॥

  ६-     जीते जी कीमत नहीं कुछ,
           माया के बाज़ार में।
           लाशों की कीमत लगे है,
           एक,दो,तीन लाख में॥

(’माया’ की   श्रृंखला  में  ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)

             डा. रमा द्विवेदी 
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June 6, 2007 - Posted by ramadwivedi | माया-श्रृंखला | | 7 Comments

7 Comments »

  1. अच्छे भाव हैं लिखते रहिये

    Comment by राकेश खंडेलवाल | June 6, 2007

  2. माया से तख्तेताज भी,
    माया बदल दे ताज भी,
    माया पलभर में बदल दे,
    ज़िन्दगी का साज भी॥

    –बहुत खूब!! वाह!! बढ़िया लगा. :)

    Comment by समीर लाल | June 6, 2007

  3. डा. रमा द्विवेदी said….

    राकेश जी एवं समीर जी,

    उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार…

    Comment by ramadwivedi | June 7, 2007

  4. माया के भंवर से उवरे तब समझो है भौर
    माया के कारण सारे बने इस जगत में चोर
    माया न जीतती चुनाव अगर इस बार
    ताज ने बदल डाला होता माया का कारोबार

    Comment by mohinder | June 7, 2007

  5. मोहिन्दर जी,

    काव्य में प्रतिक्रिया प्रेषित करने के लिये धन्यवाद……

    रमा द्विवेदी

    Comment by ramadwivedi | June 7, 2007

  6. हृदय को छू गए यह मुक्तकः
    ताज की इक-इक मीनार,
    कितनी लाशों पर टिकी?
    माया का यह मकबरा भी,
    रक्त पी कर बन सकी॥

    जीते जी कीमत नहीं कुछ,
    माया के बाज़ार में।
    लाशों की कीमत लगे है,
    एक,दो,तीन लाख में॥

    Comment by महावीर | June 16, 2007

  7. आदरणीय शर्मा जी,

    आपको मुक्तक पसन्द आए बस यही मेरे लेखन की सार्थकता है….आभार सहित…

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | June 16, 2007

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