
कुछ अपने बारे
में………
मैं डा. रमा द्विवेदी हूं।बीस वर्षों केहिन्दी अध्यापन के उपरान्त मैंने स्वैच्छिक
अवकाश ले लिया है।स्वतंत्र लेखन में कविता,कहानी, ,निबन्ध शोध-पत्र आदि में विशेष रुचि है एवं साहित्यिक पत्रिका “पुष्पक” कादमिबनी क्लब, हैदराबाद की संपादक हूं। गीत - संगीत मुझे बहुत प्रिय हैं।नारियों की दयनीय सिथति के प्रति विशेष संवेदनशील हूं। अपनी कविताओं के माध्यम से उनमें जागरुकता लाना चाहती हूं ऒर समाज के लोगों का ध्यान उनकी समस्याओं की ऒर खीचना चाहती हूं।ताकि उनको भी स्वतंत्र पहचान एवं उडान भरने के लिए खुला आसमान मिल सके। बस यही मेरे जीवन का लक्ष्य है ।मेरी अधिकतर कविताओं मेंयही भावना परिलक्षित होती है।वैसे मैं वर्षों से लिखती रही हूं लेकिन एक ही पुस्तक “दे दो आकाश” काव्य संग्रह सितम्बर २००५ में प्रकाशित हुई है।बस इतना ही बाकी आप कविताओं को पढ.कर स्वयं समझ सकेगे………..
Rama Dwivedi’s Profile
Dr Rama Dwivedi, poet and writer, has a Ph D in Hindi, and has taught as Hindi lecturer at GSM College for Women, Secunderabad. De Do Aakaash is an anthology of her Hindi poems. She has also published her work in magazines like Kadambini and Bhasha of New Delhi, Dakshin Samachar and Hindi Milap,Swatantra Varta , Sankalya , Shravanti Vivaran Patrika,Poorn Kumbh, Pushpak of Hyderabad,Kranti Swar, Dainik Jagran, Chetansi(Patna) Himalini of Kathmandu Bhasha Piyush etc. She was editor of Kavita 2004 of AIPC and Pushpak, Kadambini Club , Hyderabad since-2005. She is recipient of Subhadra Kumari Chauhan Award at All India Poetess Conference, 2004 ,‘Vidya Martandh Award’-2006 (Hyderabad) and ‘ Shreematee Suman Chaturvedi ShreShTh Saadhnaa Sammaan-2007 ’(Bhopal) She is a member of Authors Guild of India and Kadambini Club, Hyderabad.
She can be contacted at ramadwivedi@yahoo.co.in
dr. ramaji
aaj achanak aapke anubhooti kalash par haath pad gaya.
kavitayen chhalak padin.
maya ki maya toh bade bade mayaviyon ki samajh mein nahi aayi, hum aur aap jaise sansarik jeev is mayavini ke mayajaal ko bhala kahan kaat payenge. maya-phans se bachne ke liye kashiwas aur ram naam ka sahara zaroori hai.
pichle ankon mein aapki stri vishyak aur prem vishyak kavitaen acchhi hain. badhaeyan.
माया की ही छाया , may mara dil aaya, kya kare hum yae na jann paya ,kyo aaya
, kab aya ,kis nae jana
डा. रमा द्विवेदी said…
डा. रिषभ देव जी,
आज जैसे ही ‘अनुभूति कलश’ खोला आपकी प्रतिक्रिया देख कर मैं चौंक गई…विश्वास ही नही हो रहा था कि यह आपकी प्रतिक्रिया है…..यह भी माया की ही माया है कि आपका हाथ अचानक अनुभूति कलश में पड़ गया … आपको पढ़ना भी पड़ा और लिखना भी पड़ा…सच मानिए एक आनन्द की लहर दौड़ गई…..क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा मुझे तब से थी जब मैंने अपनी पुस्तक आपको प्रेषित की थी….आज का दिन मेरे लिए सौभाग्यशाली है कि आपने कुछ तो लिखा…..देर से ही सही आपने अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत किए….बहुत बहुत हार्दिक आभार…..आशा है भविष्य में भी अपना स्नेहभाव बनाए रखेंगे……सादर…
Amit ji,
Ab aap ‘Maya’ ki chaayaa me ulajhe rahiye aur khush rahiye…. aabhaar…
इस महामाया ने तो अपने रचियिता, नियन्ता तक को नहीं छोड़ा, बाँध लिया अपनी माया में, फिर हम किस खेत की मूली हैं?
माया श्रंखला की आपकी सभी रचनायें अनुपम हैं
*** राजीव रंजन प्रसाद
हरीराम जी,
सच है आपकी बात इस महामाया ने किसी को नहीं छोड़ा ……सब इसकी माया में डूबे हुए हैं……आभार सहित….
राजीव जी,
आपको माया की श्र्ंखला पसन्द आई मेरी रचनाधर्मिता सार्थक हो गई….धन्यवाद सहित…
रमा जी
हर मुक्तक में शब्दों की गहराई में चले जाएं तो एक के बाद एक माया-जाल की छुपी हुई करतूतें स्पष्ट हो जाती हैं। ‘युद्ध कितने हो गए’ पढ़ते ही कितनी ही कहानियां और घटनाएं सामने आने लगती हैं। हर मुक्तक में थोड़े से ही शब्दों में बहुत कुछ कह दिया है।
‘गागर में सागर’ देखना हो तो ‘अनुभूति कलश’ में झांक कर देख लो।
आदरणीय शर्मा जी,
आपकी अनुभवी नज़र, उदार चिंतन-मनन को मैं नमन करती हूं….आपका आशीष इसी प्रकार मिलता रहे और मेरी लेखनी को नई ऊष्मा और नई ऊर्जा मिलती रहे……इसी कामना के साथ…..सादर आभार सहित….