१- विश्व के इतिहास में,
माया के पन्ने खास हैं।
युद्ध कितनें हो गए ?
माया का ही इतिहास है॥२- अंग्रेज भी आए यहां,
माया कमाने के लिए।
माया ने घनचक्कर बनाया,
माया को पाने के लिए॥३- जो कुछ कमाया था यहां,
सब कुछ गंवा करके गए।
ब्याज में काला हुआ मुख,
इतिहास काला रच गए॥४- माया का जादू सर चढ़ा,
अब खेलने में कष्ट है।
हार जाते हैं स्वयं ही,
इश्तहार में वे व्यस्त हैं॥५- माया की ही छाया में देखो,
आतंक भी लहलहाया है।
लील जाने को यह सब कुछ,
‘सुरसा’बन जग में छाया है॥(’माया’ की श्रृंखला में ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)
डा. रमा द्विवेदी
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‘माया’श्रृंखला -५(कुछ मुक्तक)
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dr. ramaji
aaj achanak aapke anubhooti kalash par haath pad gaya.
kavitayen chhalak padin.
maya ki maya toh bade bade mayaviyon ki samajh mein nahi aayi, hum aur aap jaise sansarik jeev is mayavini ke mayajaal ko bhala kahan kaat payenge. maya-phans se bachne ke liye kashiwas aur ram naam ka sahara zaroori hai.
pichle ankon mein aapki stri vishyak aur prem vishyak kavitaen acchhi hain. badhaeyan.
माया की ही छाया , may mara dil aaya, kya kare hum yae na jann paya ,kyo aaya
, kab aya ,kis nae jana
डा. रमा द्विवेदी said…
डा. रिषभ देव जी,
आज जैसे ही ‘अनुभूति कलश’ खोला आपकी प्रतिक्रिया देख कर मैं चौंक गई…विश्वास ही नही हो रहा था कि यह आपकी प्रतिक्रिया है…..यह भी माया की ही माया है कि आपका हाथ अचानक अनुभूति कलश में पड़ गया … आपको पढ़ना भी पड़ा और लिखना भी पड़ा…सच मानिए एक आनन्द की लहर दौड़ गई…..क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा मुझे तब से थी जब मैंने अपनी पुस्तक आपको प्रेषित की थी….आज का दिन मेरे लिए सौभाग्यशाली है कि आपने कुछ तो लिखा…..देर से ही सही आपने अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत किए….बहुत बहुत हार्दिक आभार…..आशा है भविष्य में भी अपना स्नेहभाव बनाए रखेंगे……सादर…
Amit ji,
Ab aap ‘Maya’ ki chaayaa me ulajhe rahiye aur khush rahiye…. aabhaar…
इस महामाया ने तो अपने रचियिता, नियन्ता तक को नहीं छोड़ा, बाँध लिया अपनी माया में, फिर हम किस खेत की मूली हैं?
माया श्रंखला की आपकी सभी रचनायें अनुपम हैं
*** राजीव रंजन प्रसाद
हरीराम जी,
सच है आपकी बात इस महामाया ने किसी को नहीं छोड़ा ……सब इसकी माया में डूबे हुए हैं……आभार सहित….
राजीव जी,
आपको माया की श्र्ंखला पसन्द आई मेरी रचनाधर्मिता सार्थक हो गई….धन्यवाद सहित…
रमा जी
हर मुक्तक में शब्दों की गहराई में चले जाएं तो एक के बाद एक माया-जाल की छुपी हुई करतूतें स्पष्ट हो जाती हैं। ‘युद्ध कितने हो गए’ पढ़ते ही कितनी ही कहानियां और घटनाएं सामने आने लगती हैं। हर मुक्तक में थोड़े से ही शब्दों में बहुत कुछ कह दिया है।
‘गागर में सागर’ देखना हो तो ‘अनुभूति कलश’ में झांक कर देख लो।
आदरणीय शर्मा जी,
आपकी अनुभवी नज़र, उदार चिंतन-मनन को मैं नमन करती हूं….आपका आशीष इसी प्रकार मिलता रहे और मेरी लेखनी को नई ऊष्मा और नई ऊर्जा मिलती रहे……इसी कामना के साथ…..सादर आभार सहित….