अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

माया-श्रृंखला-६ (कुछ मुक्तक)

   १-       संसार के कल्याण हित,
             यमुना बनी,सरस्वती बनी।
             पापियों के पाप धोके,
             मंदाकिनी मैली बनी॥

    २-     राधा बनी,मीरा बनी,
             पत्थर कभी वो बन गई।
             सीता ने दी अग्नि-परीक्षा,
             परित्यक्ता बन,वन को गई॥

    ३-     माया बनी मायाविनी,
             रूप कितने धर लिए।
             असुरों का संहार करके,
             मुंड़माल पहन लिए॥

    ४-     रक्त-बीज जब-जब हुए,
             दुर्गा भी काली बन गई।
             रक्त की हर बूंद पीकर,
             खप्पर भर कपाली बन गई॥

    ५-    आजादी के संग्राम में,
            ‘रानी’बनी थी चण्डिका।
             देखकर उसका युद्ध-कौशल,
             शत्रुदल भी दंग था॥

     ६-     जीते जी न दे सकी थी,
             जन्मभूमि की आन को।
             मिट गई थी खुद ही,पर
              बेंचा न था स्वाभिमान को॥

(’माया’ की   श्रृंखला  में  ‘माया’ शब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)

                डा. रमा द्विवेदी

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June 19, 2007 - Posted by ramadwivedi | माया-श्रृंखला | | 5 Comments

5 Comments »

  1. भाव में डूब कर आनन्द लिया गया, आभार एवं बधाई. :)

    Comment by समीर लाल | June 19, 2007

  2. बहुत सुंदर माला पिरोई है आपने माया श्रंखलाओं की।

    Comment by अभिनव | June 20, 2007

  3. समीर जी एवं अभिनव जी,

    उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार…..अपने विचारों से अवगत कराते रहियेगा….इसी कामना के साथ…

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | June 20, 2007

  4. आज धनमान ने स्वाभिमान का स्थान ले लिया है। काश! आज के नेता, मिनिस्टर्स,
    धनलोलुप फिल्मकार आदि माया श्रृंखला को पढ़ते तो संभवतः इन हृदयहीन लोगों के
    मस्तिष्क में कुछ असर हो जाता।
    जीते जी न दे सकी थी,
    जन्मभूमि की आन को।
    मिट गई थी खुद ही,पर
    बेंचा न था स्वाभिमान को॥
    बहुत प्रभावशाली है।

    Comment by महावीर | July 5, 2007

  5. आदरणीय शर्मा जी,

    मेरी पूंजी तो बस आपका आशीष ही है…हार्दिक आभार सहित…

    Comment by डा. रमा द्विवेदी | July 5, 2007

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