‘ माया’श्रृंखला-७ (कुछ मुक्तक)

   १-          माया के द्वारा ही तो,
                योग्य वर पा जाती हैं।
                माया के कारण ही तो,
                धूं-धूं कर जल जाती हैं॥

       २-    बाप की पगड़ी के खातिर,
                कितने-कितने गरल पी लेती है?
                खून पी-पीकर खुद का ही वह,
                लाश बनकर जी लेती है॥

       ३-    शिव ने पिया था इक बार विष,
                ‘नीलकंठ’ बन विभूषित हुए।
                बदन पर सहस्त्रों नील है जिसके,
                अनदेखे-अगणित ही रह गए॥

       ४-    तन की क्या बात करें जब,
                धड़कनें तक लुट जाती हैं।
                अहसासों की कुछ बात करें गर,
                अर्थियां उठ जाती हैं॥

        ५-   कितनी हैं वे खुशनसीब,
                जिनको मिल जाता है क़फ़न?
                बेटियां ऐसी भी हैं कुछ?
                ज़िन्दा हो जाती हैं दफ़न॥

(’मायाकी श्रृंखला में मायाशब्द अनेकानेक अर्थों में अभिव्यक्त हुआ है…..पाठकों से अनुरोध है कि वे उसके भाव में डूब कर आनन्द ले सकेंगे)

                डा. रमा द्विवेदी

               © All Rights Reserved

Published in: on June 22, 2007 at 5:10 pm Comments (6)

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6 Comments Leave a comment.

  1. कितनी हैं वे खुशनसीब,
    जिनको मिल जाता है क़फ़न?
    बेटियां ऐसी भी हैं कुछ?
    ज़िन्दा हो जाती हैं दफ़न॥
    very nice and true

  2. रचना जी,

    प्रथम तो ‘अनुभूति कलश’ में आने के लिए हार्दिक स्वागत है…..मुक्तक पसन्द आए उसके लिए बहुत बहुत आभार…

  3. हालांकि पांचों मुक्तक बहुत ही प्रभावपूर्ण हैं किंतु चौथे और पांचवे मुक्तकों ने तो
    मस्तिष्क को झंझोड़ कर रख दिया, जैसे मस्तिष्क वहीं रुक गया।
    बधाई स्वीकारें।

  4. आदरणीय शर्मा जी,

    समाज की यह कटु सच्चाई धमनियों में बहते रक्त को हिम सा जमा देती है लेकिन समाज में बदलाव के आसार बहुत कम ही नज़र आते हैं।बेटियों के दर्द को सदियों से समाज ने न समझा है न समझना चाहता है। मुक्तक पसन्द आए इसके लिए दिल से आभारी हूं….

  5. bas niruttar hoon

  6. Shubhasheesh ji,

    haardik abhaar…


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