खतरा अस्तित्व का

             किसी को हद से ज्यादा मत चाहो?
             पूरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है।
             खोकर अपनी पहचान,
             आदमी न जी पाता है,न मर पाता है।
             पूरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है॥

             किसी से प्रेम इतना न करो?
             कि वो विवशता का रूप  ले ले।
             क्योंकि विवशता को ढ़ोंने में,
             जीवन व्यर्थ चला जाता है।
             पूरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है॥

             प्रेम जीवन के लिए है अनिवार्य,
             किन्तु वह जीवन का लक्ष्य नहीं,
             प्रेम में तपने-मिटने के सिवा,
             कुछ हाथ नहीं आता है?
             पूरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है॥

             ज़िन्दगी सिर्फ प्रेम से चल सकती नहीं,
             ज़िन्दगी एक ही बिन्दु पर रुक सकती नहीं,
             किन्तु प्रेम की अनुभूति से,
             जीवन संभल-संवर जाता है।
             पूरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है॥

             (१९८७ में लिखी गई रचना)

                डा. रमा द्विवेदी

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Published in: on July 12, 2007 at 5:12 pm Comments (8)

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8 Comments Leave a comment.

  1. सत्यता का बोध कराती आप की रचना बहुत सुन्दर बन पड़ी है।जीवन में प्रेम के अनुभवों को बखूबी दर्शाया है आप ने।बधाई।

    ज़िन्दगी सिर्फ प्रेम से चल सकती नहीं,
    ज़िन्दगी एक ही बिन्दु पर रुक सकती नहीं,
    किन्तु प्रेम की अनुभूति से,
    जीवन संभल-संवर जाता है।
    पूरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है॥

  2. परमजीत बाली जी,

    आपको कविता पसन्द आई…बहुत बहुत आभार..

  3. मन के उमड़ते भावों को बहुत ईमानदारी और सुंदरता से कहा है आपने …बधाई

  4. शुक्रिया रितेश जी…भली लगी आपकी बात :)

  5. khokar apni pahchan
    adami na ji pata hai na mar pata hai….
    pura astitva hi khatare me pad jata hai……
    really mujhe kafi pasand aai ye line….

  6. Niharika ji,
    Bahut bahut shukriya …

  7. प्रेम की अनुभूति से,
    जीवन संभल-संवर जाता है।

  8. डा. रमा द्विवेदीsaid….

    विजय जी,

    अनुभूति कलश में आपका स्वागत है…प्रथम बार अपनी अनुभूति जताने के लिए हार्दिक आभार…आशा है भविष्य में भी स्नेहभाव बनाए रखेंगे।


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