August 26, 2007 at 4:46 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
१- टेस्ट ट्यूब बेबी तो अभी जन्में हैं,
ये बनावटी लोग कहां से आते हैं।
बनावटी चेहरों की नकल करते-करते,
असली चेहरा ही भूल जाते हैं॥
२- चेहरे पर सच्चाई का नूर नहीं,
बेईमानी का लबादा है।
झूठ में रात-दिन गुजारते हैं,
पूरा करते नहीं अपना वादा है॥
३- क्या हुआ अगर हम आपके अज़ीज़ नहीं,
हम भी इंसान हैं हम दिल के गरीब नहीं।
इंसानियत अभी जिन्दा है,दिल की मरीज़ नहीं,
चलें सब साथ-साथ क्या कोई तरकीब नहीं?
४- छोटी सी ज़िन्दगी में झगड़ा है किस बात का?
प्यार से हम सब रहें संकल्प लें इस बात का।
बांट लें सुख-दु:ख सबके जीवन के दिन रात का,
क्यों नहीं जुड़ पाते हम प्रश्न है इस बात का?
डा. रमा द्विवेदी
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August 16, 2007 at 12:29 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
हे मानव !
तुम वटवृक्ष मत बनो,
नई पौध को भी उगने दो,
माना कि तुम महान हो,
सुदृढ़ शक्तिमान हो,
इसलिए जमकर डटे हो,
नहीं फटकने देते किसी को,
इसलिए सदियों तक खड़े हो।
पूरी जीवन-ऊर्जा अगर तुम ही ले लोगे,
तो आस-पास के पौधों का क्या होगा?
मर जायेंगे वे असमय में ही,
वह भी तुम्हारे कारण ,
क्योंकि तुम्हारी छाया में,
कोई पौधा पनप नहीं सकता।
तुम्हारी महानता इसमें नहीं
कि तुम किसी को पनपने न दो,
तुम अगर छाया न भी दो,
तो कोई अन्य पेड़ छाया देगा,
किन्तु तुम्हारी तरह,
जीवन तो नहीं छीनेगा।
अच्छी तरह सोच लो,
अन्य पेड़ हैं इसलिए,
तुम्हारा अस्तित्व महान है।
लघुता न हो तो गुरुता का महत्व क्या?
रात न हो तो दिन का अस्तित्व क्या?
सबलता अगर किसी के काम न आए?
तो वह धरती पर बोझ बन जाती है,
और धरती भी उसके बोझ से,
मुक्त होना चाहती है।
( ’ Be Not a Banyan Tree ’ इस कविता का अनुवाद है)
डा. रमा द्विवेदी
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August 14, 2007 at 10:00 am (सृजन के प्रिय क्षण)
स्वतन्त्रता दिवस के शुभ अवसर पर अपने काव्यसंग्रह ’दे दो आकाश’ से एक गीत प्रस्तुत कर रही हूं…..
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
सारे जहां में हो रही रुसवाई है।
’सारे जहां से अच्छा’ गाते रहे हैं हम,
अतीत के गौरव को मिट्टी में मिलाई है..
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
दल बदल रहे हैं कुर्सी के वास्ते सब,
निज स्वार्थ के लिए सब लड़ रहे लड़ाई है…
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
जाने कहां गए वे जो वतन पे जान देते थे,
आज तो पद के लिए हो रही आपाधाई है…
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
गैरों के ज़ुल्म सहते, शिकवा न था किसी से,
अपनों के ज़ुल्म देखकर, रूह थर्राई है….
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
अंधेरों से उजालों में खतरे का डर है ज्यादा,
मंदिरों में भी ज़िन्दगी खून से नहाई है…
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
दहेज वास्ते बहुएं सताई जाती हैं,
अपनों के द्वारा ही नारी गई जलाई है….
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
नारी पे ज़ुल्म करके, मर्दानगी दिखाते,
किस धर्म ने यह क्रूरता सिखाई है?
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
आज़ाद देश में नारी पे ज़ुल्म होते क्यों?
हमारे देश की यह कौन सी बड़ाई है?
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
गुजरात और कश्मीर में लाशें पटी हुई हैं,
खुदा बचाओ अब जान पर बन आई है….
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
चारो तरफ है दहशत, सुरक्षित नहीं कहीं?
हत्यायें देख-देख ज़िन्दगी खुद पे लजाई है…
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
डा. रमा द्विवेदी
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August 12, 2007 at 2:56 pm (माया-श्रृंखला)
१- जीव का आवागमन,
‘माया’का ही सब काम है।
‘माया’ स्वाचालित सृष्टि है,
‘माया’ ही विश्वप्रधान है॥
२- निर्धनी गर मर गया यूं,
घर को क्या दे पायेगा?
विस्फोट में गर वो मरेगा,
कुछ तो अर्थ पायेगा॥
३- श्मशान जाने के लिए,
माया लगाती बोली है।
कोई चंदन संग जले और,
किसी की जलती होली है॥
४- माया के द्वारा ही तो,
अर्थी तक सज जाती है।
अर्थ कितना दे गए ?
दुनिया को यह बतलाती है॥
डा. रमा द्विवेदी
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August 11, 2007 at 5:24 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
१- दुनिया नहीं समझती,
मेरा वजूद क्या है?
करती है भंग ’शान्ति’
मेरा कसूर क्या है?
२- ’विश्वास’ के किए टुकड़े,
इंसां इंसां को डस रहा है।
ज़ज़्बात सब भस्म हुए,
हर रिश्ते पर वो शक कर रहा है॥
३- ’प्रेम’ के बिना यहां,
कुछ भी नहीं जहां में।
देता है मिटा इसे भी वो,
कैसा है बावला ये॥
४- बचती ’उम्मीद’ इक है,
इंसान के दिलों में।
लाती है फिर से खुशियां,
इंसान के दिलों में॥
डा. रमा द्विवेदी
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August 8, 2007 at 4:58 am (चित्र-वीथि)
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August 8, 2007 at 4:36 am (चित्र-वीथि)
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August 7, 2007 at 5:36 pm (चित्र-वीथि)
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