कुछ मुक्तक
August 11, 2007 at 5:24 pm (सृजन के प्रिय क्षण)
१- दुनिया नहीं समझती,
मेरा वजूद क्या है?
करती है भंग ’शान्ति’
मेरा कसूर क्या है?२- ’विश्वास’ के किए टुकड़े,
इंसां इंसां को डस रहा है।
ज़ज़्बात सब भस्म हुए,
हर रिश्ते पर वो शक कर रहा है॥३- ’प्रेम’ के बिना यहां,
कुछ भी नहीं जहां में।
देता है मिटा इसे भी वो,
कैसा है बावला ये॥४- बचती ’उम्मीद’ इक है,
इंसान के दिलों में।
लाती है फिर से खुशियां,
इंसान के दिलों में॥डा. रमा द्विवेदी